Tumne Kaha Tha

तुमने कहा था- सरि सागर की पाती

परिचर्चा/समीक्षा- देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’

साहित्य मनुष्य की अंतश्चेतना का दर्पण है और प्रेम उस चेतना की सबसे पवित्र अभिव्यक्ति। आज के त्वरित संदेशों और भौतिकतावादी युग में जहाँ संबंध क्षणभंगुर होते जा रहे हैं, वहीं अमर नाथ सिंह ‘मोही’ (सागर) का सद्य-प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘तुमने कहा था (सरि-सागर की पाती)’ प्रेम की उस पावन, निश्छल और आत्मिक साधना की याद दिलाता है, जहाँ दो आत्माएं देह की सीमाओं से परे एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं। यह केवल कविताओं की पुस्तक नहीं है, बल्कि दो संवेदनशील हृदयों—‘सरि’ (सरिता) और ‘सागर’—के बीच बरसों चले पत्राचार और काव्यात्मक संवाद की एक भावपूर्ण दस्तावेज़ है। ‘सरि’ की प्रेरणा और उनके अंतिम संकल्प को पूरा करते हुए कवि ने इन पातियों को गीतों में ढाला है, और बड़ी सुघड़ता और संवेदनशीलता के साथ पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया है।

इस कृति की मूल आत्मा निष्काम और निष्कलुष अनुराग है। जैसा कि रचनाकार स्वयं स्वीकारते हैं—यह संबंध देह या अधिकार का नहीं, बल्कि रूहानी मिलन का था। जहाँ प्रेम कोई दावा नहीं करता, कोई ख्याति नहीं मांगता, केवल स्वयं को समर्पित कर देता है। संग्रह में मिलन के उल्लास से अधिक विरह की गरिमा और प्रतीक्षा की तड़प दिखाई देती है। बीस वर्षों के लंबे अंतराल, सामाजिक मर्यादाओं, पारिवारिक दायित्वों और अनकही टीस के बीच भी यह प्रेम कभी मैला नहीं हुआ। ‘बीस बरस के बाद’ शीर्षक रचना इस संग्रह का एक अत्यंत भावुक पड़ाव है, जहाँ नियति के हाथों अलग हुए दो प्रेमी जब जीवन की ढलती साँझ में मिलते हैं, तो कोई शिकवा नहीं, केवल एक-दूसरे के प्रति गहरी कृतज्ञता और सम्मान शेष रहता है:

“हम न बन सकी राधा तेरी, हम न बन सकी सीता।

मगर तुम्हारी याद लौट कर, फिर-फिर आई है॥”

हिंदी साहित्य में पत्र-काव्य की एक सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। इस संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें केवल एकतरफा संवाद नहीं है; ‘सरि’ द्वारा नैनीताल से भेजे गए पत्र और सागर द्वारा दिए गए काव्यात्मक उत्तर एक-दूसरे के पूरक बनकर चलते हैं। पत्रों का यह काव्यात्मक रूपांतरण पाठकों को सीधे उस कालखंड और भावावेश से जोड़ता है। कवि की लेखनी में पारंपरिक भारतीय गीतों की मधुरता और प्रवाह है। ‘और तुम्हें क्या दे पाऊंगा’, ‘यादों की खिड़की से’, ‘हमने गीत लिखे जीवन के’ और ‘अद्भुत प्रीति निभाने की’ जैसी रचनाएं सहज ही गुनगुनाने योग्य हैं। भाषा में तत्सम शब्दों के साथ-साथ लोक-प्रचलित मुहावरों का सुंदर संतुलन है। संग्रह केवल मानक हिंदी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अवधी की सोंधी सुगंध भी घुली है। ‘परदेशी की होली’ फागुन के उल्लास के साथ-साथ विरहिणी के अंतर्द्वंद्व को लोक-संवेदना के साथ जीवंत करती है:

“काहू के लगन होई, काहू के सगुनवाँ।

आयल होई हमरेउ, नगरी फगुनवाँ॥”

गीतों और नवगीतों के अतिरिक्त पुस्तक में दोहे, रुबाइयाँ, ग़ज़लें और मुक्तक भी शामिल हैं। राधा-कृष्ण के प्रतीकों के माध्यम से उपालंभ (उलाहना) और विरह की अभिव्यक्ति रचनाकार के गहरे सांस्कृतिक बोध को दर्शाती है। ‘टूटा दर्पण’ जैसी कविता में कवि की जीवन-दृष्टि उभरकर सामने आती है, जहाँ संघर्षों से हार न मानने और जीवन के हर सुख-दुख को समभाव से स्वीकारने की प्रेरणा मिलती है।

‘तुमने कहा था (सरि-सागर की पाती)’ एक ऐसा काव्य-संग्रह है जो हृदय के तारों को झंकृत करता है। यह उन सभी पाठकों के लिए एक अनिवार्य पठनीय कृति है जो प्रेम को केवल एक भावना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना मानते हैं। अमर नाथ सिंह ‘मोही’ की यह रचना साबित करती है कि यदि प्रेम सच्चा हो, तो वह समय और दूरी की सीमाओं को लांघकर अमर साहित्य बन जाता है।