मदन मोहन 'मैत्रेय'

मदन मोहन “मैत्रेय” का जन्म बिहार राज्य के दरभंगा अनुमंडल अंतर्गत रतनपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद आपने शिक्षा प्राप्त की और साहित्य के प्रति आपकी ललक बाल्यकाल से ही परिलक्षित होती रही। यही ललक धीरे-धीरे आपकी पहचान बन गई और ईश्वर की कृपा से वर्ष 2022 में आपकी चार महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन उपन्यास और एक काव्य-संग्रह शामिल है। आपकी लेखनी समाज की ज्वलंत समस्याओं, युवाओं की मनोदशा, और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।

झलक आजकल की (व्यंग्य-कथा)

“ओ जी बल्ले-बल्ले!”
उसके मुँह से निकला यह मधुर अभिनंदन का स्वर — जो उसके लिए मधुर था, परंतु मेरे लिए कर्कश। वह स्वर जैसे ही मेरे कानों से टकराया, मैं उछल पड़ा। अजी, उछल क्या पड़ा, मेरा पूरा अस्तित्व आंदोलित हो उठा! लेकिन मेरी इस स्थिति से उस नौजवान को, जिसने अभी-अभी जवानी के बसंत में कदम रखा था, कोई फर्क नहीं पड़ा। तभी तो, वह अपने होंठों पर मंद-मंद मुस्कान सजाए मेरे और करीब आ गया — शायद इतना करीब कि साँसें तक महसूस हों।
गनीमत रही मेरी जड़बुद्धि की, जिसने तत्काल निर्णय लिया और भीतर उठे विरोध के स्वर को ऊँचा कर दहाड़ने की कोशिश की। परंतु वह दहाड़ कंठ तक आते-आते मिमियाहट में बदल गई।
बाहर जो स्वर निकला, वह बकरी के मिमियाने से ज़्यादा कुछ नहीं था। इसलिए विरोध जताने के बावजूद भी उस नौजवान पर कोई असर नहीं हुआ। वह अर्थपूर्ण मुस्कराहट मेरी ओर फेंकता हुआ मेरी आँखों में झाँकने लगा — शायद वह उनमें समंदर की गहराई तलाश रहा था। परंतु… मुझे तो पता था, इन आँखों में ऐसी कोई गहराई नहीं ! साथ ही मैंने यह भी परख लिया कि वह नौजवान जो स्मार्ट दिखने की कोशिश कर रहा था, वैसा कुछ भी नहीं था। मतलब साफ था — उसने अपने पूरे शरीर पर मेकअप नामक डेकोरेशन चढ़ा रखा था, जो दूर से देखने पर निहायत ही भद्दा लग रहा था। किन्तु रुआब!
हाँ, उसकी हरकत से तो यही प्रतीत हो रहा था कि उसे अपने व्यक्तित्व और सुंदरता पर अत्यधिक घमंड है। तभी तो, इतराते हुए वह मेरे और करीब आया और इस तरह से संबोधित किया मानो वर्षों से मुझे जानता हो, हर महफिल में साथ रहा हो — जैसे या तो वह मेरा शागिर्द हो या मैं उसका। पर मैं जो कि उससे अंजान था और इस समय उसकी हरकतों से खफा भी, अपने चेहरे पर दुनिया भर की नाराज़गी समेटते हुए बोला —
“जी नहीं, मैंने आपको पहचाना नहीं। वैसे भी, याद नहीं आता कि आपसे कभी मिला होऊँ।”
यह कहकर मैं मौन हो गया। पर हृदय तो मौन नहीं रह सका — मन में यही इच्छा थी कि इस अनजाने से जल्द से जल्द पीछा छूटे। वैसे भी,
“जान न पहचान — मैं तेरा मेहमान” वाली उसकी हरकत ने मुझे उलझन में डाल दिया था।
लेकिन मेरे मन के इस विरोध से वह अनजान ही रहा। तभी तो, अपनी बत्तीसी निपोरते हुए बोला-
“अजी श्रीमान! पहचान को लेकर संकट में क्यों हैं? अब जब हम मिल ही गए हैं, तो पहचान अपने आप हो जाएगी।”
यह कहकर वह कुछ पल के लिए रुका — जैसे कोई भूमिका तलाश रहा हो। फिर खिलखिलाकर हँस पड़ा —
“हा हा हा हा! श्रीमान, वैसे बुरा न मानें तो हम लोग एक सेल्फी ले लेते हैं — यादगार के रूप में।”
कहते हुए उसने मोबाइल निकाल लिया और मेरे और करीब आ गया। मैं अचंभित-सा उसकी हरकतें देखता रह गया। उसने मेरा कंधा पकड़ा, अपना कंधा उससे सटा दिया और मोबाइल को हवा में उठा लिया। फिर मेरी आँखों में देखते हुए बोला —
“अजी, मुस्करा भी दो जनाब!”
लेकिन मैं मुस्कान लाऊँ तो कहाँ से? वैसे भी आजकल मुस्कान बिकती नहीं कि खरीद ली जाए!
पर जबरदस्ती की इस गले पड़ी ‘दोस्ती’ से पीछा छुड़ाना था, तो मुस्कराना ज़रूरी था।
तभी मैंने नाप-जोखकर होंठों को थोड़ा-सा फैलाया और मुस्कराया। बस, उसने फोटो क्लिक की और तुरंत फेसबुक पर अपलोड करने लगा। मुझे झटका लगा — अजी, झटका इस बात का नहीं कि फोटो फेसबुक पर जा रही थी, बल्कि इसलिए कि उसने कैप्शन लिखा था —
“ज़िंदगी का फलसफ़ा — रास्ते पर मिले, मरहबा!”
उसकी इस हरकत से मैं थोड़ा बौखला गया, थोड़ा-सा सकपकाया। मामला समझ नहीं आया तो हल्की-सी शर्म भी महसूस हुई। मूँछों में उँगली फेरते हुए बोला —
“अजी जनाब, पहचान कर न सही, कर ही लेते! फोटो खींचकर अपने एल्बम में भर लेते। मगर आपकी इन हरकतों का माजरा क्या है?”
मेरे इस शायराना अंदाज़ पर वह और ज़्यादा मुस्कराया। बत्तीसी की चमक थोड़ी और बढ़ाई और आँखों में झाँककर बोला —
“आजकल फेसबुक पर लाइव स्ट्रीमिंग का दौर है जनाब!
फ्रेंड फ़ॉलोइंग बनाए रखने के लिए रोज़ कुछ नया करना पड़ता है। वैसे, आपको बता दूँ — मेरे डेढ़ लाख फ़ॉलोअर्स हैं।”
यह कहकर वह उसी रफ्तार से दूर जाने लगा, जिस रफ्तार से आया था। मेरे मन में अनेक प्रश्न उछल-कूद करने लगे। इच्छा हुई, उसे रोककर जवाब लूँ, पर न हिम्मत जुटी न वह रुका। बस कुछ ही पलों में वह आँखों से ओझल हो गया। परंतु कुछ देर तक मेरा मन सामान्य नहीं हो सका।
उलझनें थीं, प्रश्न थे — यही कि “यह कैसी पहचान थी?”
और इसे आखिर कौन-सा नाम दिया जाए ? वैसे, उस नौजवान ने जाते-जाते मेरी आँखें खोल दी थीं। अब मैं समझ चुका था कि ज़िंदगी में अगर सफल होना है, तो “फ्रेंड फ़ॉलोइंग बढ़ाओ, फिर लाइक्स और कमेंट्स के लिए कुछ भी क्लिक करो और अपलोड कर दो।”
आख़िरकार, यह मीडिया का ज़माना है — और कहावत है न, “जो दिखता है, वही बिकता है।”
फिर क्या था — मैंने भी आजकल की सफलता के इस बीज-मंत्र को समझ लिया।
इस बार सच में मुस्कराया और आगे बढ़ गया — सफलता के नए पथ पर चलने के लिए। साथ ही मन-ही-मन उस नौजवान को धन्यवाद दिया, जिसने जाने-अनजाने में “सफलता का रहस्य” बता दिया था।