मदन मोहन 'मैत्रेय'
मदन मोहन “मैत्रेय” का जन्म बिहार राज्य के दरभंगा अनुमंडल अंतर्गत रतनपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद आपने शिक्षा प्राप्त की और साहित्य के प्रति आपकी ललक बाल्यकाल से ही परिलक्षित होती रही। यही ललक धीरे-धीरे आपकी पहचान बन गई और ईश्वर की कृपा से वर्ष 2022 में आपकी चार महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन उपन्यास और एक काव्य-संग्रह शामिल है। आपकी लेखनी समाज की ज्वलंत समस्याओं, युवाओं की मनोदशा, और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।
लावण्य प्रेम (भाग-5)
रात के दस बजे, शाहदरा पुलिस स्टेशन!
आम दिनों की अपेक्षा आज यहाँ कुछ विशेष हलचल थी, क्योंकि मामला एक प्रतिष्ठित परिवार से जुड़ा था। इसलिए इंस्पेक्टर साहब कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे। तभी तो उन्होंने फार्म हाउस पर ज़रूरी छानबीन करके लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था और उन पाँचों लड़कों को साथ लेकर थाने आ गए थे।उनके साथ ललिता भी आ गई थी। शिशिर की पारिवारिक पहुँच और ललिता के पिता के सामाजिक संपर्कों के कारण इंस्पेक्टर साहब जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहते थे। किंतु एक बात उनकी समझ में नहीं आ रही थी कि ललिता, जिसका इस मामले से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था, वह फार्म हाउस क्यों पहुँची? …और फिर वहाँ से पुलिस स्टेशन तक भी चली आई!
खैर, इस विषय पर बाद में भी मंथन किया जा सकता था। फिलहाल तो उन्हें फार्म हाउस की घटना पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना था, क्योंकि वे जानते थे कि उन पाँचों को महज़ शक की बुनियाद पर ज़्यादा देर कस्टडी में नहीं रखा जा सकता। खासकर शिशिर को, जो एक बड़े बाप की इकलौती औलाद था। ऐसे में उसके पिता वकील को लेकर आते ही होंगे, अतः वे ज़रूरी कागज़ी कार्रवाई पूरी कर लेना चाहते थे।उधर, विज़िटिंग रूम में शिशिर के साथ वे चारों लड़के बैठे थे और उनके सामने ललिता बैठी थी। पुलिस स्टेशन आने के बाद से उन चारों लड़कों के चेहरे की हवाइयाँ उड़ी हुई थीं। इसके विपरीत, शिशिर फार्म हाउस के वक्त से ही उलझन में घिरा हुआ था। उस पर यह उलझन तब से हावी थी, जब से ललिता ने फार्म हाउस में कदम रखा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह वहाँ क्यों आई?
आखिर उसे इस घटना की जानकारी किसने दी होगी? …फिर उसका इस तरह अचानक घटनास्थल पर आना, इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? क्योंकि इससे पहले वह कभी उन लोगों के करीब नहीं आई थी। जब उनके बीच कोई प्रगाढ़ संबंध नहीं था, तो अचानक इस हादसे की खबर मिलते ही आ जाना, इसका क्या मतलब हो सकता था?
हालाँकि, वह अच्छी तरह जानता था कि ललिता एक मिलनसार स्वभाव की लड़की थी। वह जितनी सुंदर थी, उससे कहीं ज़्यादा उसका मन सुंदर था। तभी तो कॉलेज में वह किसी के भी सुख-दुख में शामिल हो जाती थी, किसी से भी उसका हाल-चाल पूछ लेती थी और खुलकर हँस-बोल लेती थी। किंतु वह इतनी भी भोली नहीं थी कि भावनाओं में बहकर ऐसे आपराधिक मामलों में भी शामिल हो जाए।बस, यही कारण था कि शिशिर के दिल में कुछ खटक रहा था। वह मन ही मन तमाम कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रहा था और सभी संभावनाओं को सिरे से टटोल रहा था, किंतु दुविधा यह थी कि वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा था।
दूसरी ओर, सामने बैठी ललिता बारी-बारी से उन पाँचों के चेहरों को देख रही थी और सोच रही थी—इनमें से हत्यारा कौन होगा? इनमें से किसने और क्यों प्रितेश की हत्या की होगी? वह प्रितेश के प्रति पहले से ही थोड़ा जुड़ाव महसूस करती थी, इसलिए अचानक उसकी हत्या की खबर सुनकर वह स्तब्ध (Shocked) रह गई थी और खुद को रोक नहीं पाई थी।तभी तो सूचना मिलते ही वह घटनास्थल पर पहुँच गई थी। उसने तालाब में तैरती हुई असहाय प्रितेश की लाश को देखा था और तब से ही सोच में डूब गई थी। इसके बाद पुलिस वाले उसे भी साथ लेकर यहाँ आ गए थे, लेकिन यहाँ आने की कोई चिंता उसके मन में नहीं थी।वह तो इस बात को लेकर बेचैन थी कि प्रितेश की हत्या किसने और क्यों की होगी? हाँ, वह प्रितेश को अच्छे से जानती थी; वह बहुत मिलनसार था और किसी से द्वेष नहीं रखता था। ऐसे में उसकी हत्या भला कौन कर सकता है?
यही वह प्रश्न था जो उसके लिए यक्ष प्रश्न बन चुका था। इसीलिए वह बारी-बारी से उन पाँचों के चेहरों को देख रही थी और यह समझने की कोशिश कर रही थी कि कहीं इनमें से ही किसी ने तो हत्या नहीं की? हाँ, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता था। परंतु उन पाँचों के चेहरों को देखकर ऐसा नहीं लगता था कि हत्या जैसे जघन्य अपराध को उन्होंने अंजाम दिया होगा।
“चलो, आप लोगों को इंस्पेक्टर साहब ने बुलाया है।”
विचारों में खोए हुए उन सभी का ध्यान तब टूटा, जब एक सिपाही ने अचानक वहाँ आकर यह कहा और तुरंत उल्टे पाँव लौट गया। तब वे सभी उठे, शंकित नज़रों से एक-दूसरे को देखा और इंस्पेक्टर साहब के केबिन की ओर बढ़ गए। मन में वही एक सवाल था कि ‘अब आगे क्या होगा?’ इस डर से उनके कदम भारी हो रहे थे, किंतु इस परिस्थिति से बचना भी तो मुमकिन नहीं था।इसलिए न चाहते हुए भी आखिरकार वे इंस्पेक्टर साहब के केबिन में पहुँचे और सिर झुकाकर एक कतार में खड़े हो गए। इंस्पेक्टर साहब ने बारी-बारी से उनके चेहरों को देखा; उनकी कोशिश यही थी कि वे चेहरों को पढ़कर मन के भावों को भाँप लें, किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। तब वे ललिता से बोले—
“मिस ललिता! मैंने छानबीन की है और फिलहाल इस केस से आपका कोई संबंध नज़र नहीं आ रहा है, इसलिए आप जा सकती हैं।” उन्होंने कहा और फिर ललिता के चेहरे को देखने लगे, जहाँ उनकी बात सुनते ही राहत के भाव उभर आए थे।हाँ, इंस्पेक्टर साहब की बात सुनकर उसने सच में राहत की साँस ली थी। वैसे भी उसके मोबाइल पर बार-बार किसी अज्ञात (Unknown) नंबर से मिस्ड कॉल आ रहे थे। इसलिए जैसे ही अनुमति मिली, वह बाहर निकल गई। तब इंस्पेक्टर साहब ने शिशिर के चेहरे की ओर देखा और शांत स्वर में बोले—
“तो मिस्टर शिशिर! क्या आप बता सकते हैं कि जब आप छहों दोस्त पार्टी कर रहे थे, तो अचानक आपके बीच से प्रितेश कैसे गायब हो गया? और गायब भी हुआ तो ऐसे कि उसकी निर्मम हत्या हो गई?” उन्होंने पूछा और अपनी निगाहें उसके चेहरे पर टिका दीं, जहाँ यह प्रश्न सुनते ही अनिश्चितता के भाव साफ़ दिखने लगे थे। शिशिर ने इंस्पेक्टर साहब की ओर देखा और शब्दों को तौल-तौलकर बोला—
“सर! इस बारे में भला हम लोग कैसे बता सकते हैं? हम तो बस वहाँ खुशियाँ मनाने के लिए इकट्ठा हुए थे। बस पता नहीं क्या हुआ, वह अचानक हमें नज़र नहीं आया तो हम लोग उसे ढूँढने लगे। जब वह कहीं नहीं मिला, तो हमने बिल्डिंग से बाहर निकलकर देखा। तालाब में उसकी लाश तैर रही थी, बस हमने तुरंत आपको फोन कर दिया।” वह एक ही साँस में बोल गया और फिर उनकी ओर देखने लगा।
“ठीक है, मैं आपकी बात मान लेता हूँ। बस आप मुझे इतना बता दीजिए कि आखिर ऐसी क्या खुशी थी, जिसे सेलिब्रेट करने के लिए आप छह दोस्त जुटे थे और जमकर शराब की महफ़िल जमानी पड़ गई?” इंस्पेक्टर साहब ने पहला सवाल खत्म होते ही दूसरा प्रश्न दाग दिया।अब शिशिर से कोई जवाब देते नहीं बना और वह बगलें झाँकने लगा। शायद वह इस समय और बुरी तरह उलझ जाता, लेकिन तभी उसने देखा कि उसके पिता वकील के साथ केबिन में प्रवेश कर रहे हैं। उन्हें देखकर उसने राहत की साँस ली; वह समझ गया कि फिलहाल वह बच गया है।
हाँ, ठीक यही बात इंस्पेक्टर साहब भी बोल पड़े, “फिलहाल तो तुम लोग बच गए हो, किंतु मर्डर के सस्पेक्ट हो। इसलिए जब तक केस की छानबीन पूरी नहीं हो जाती, तुम लोग बच नहीं सकते।” उन्होंने कहा और फिर वकील साहब से बातचीत करने लगे।
