मदन मोहन 'मैत्रेय'

मदन मोहन “मैत्रेय” का जन्म बिहार राज्य के दरभंगा अनुमंडल अंतर्गत रतनपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद आपने शिक्षा प्राप्त की और साहित्य के प्रति आपकी ललक बाल्यकाल से ही परिलक्षित होती रही। यही ललक धीरे-धीरे आपकी पहचान बन गई और ईश्वर की कृपा से वर्ष 2022 में आपकी चार महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन उपन्यास और एक काव्य-संग्रह शामिल है। आपकी लेखनी समाज की ज्वलंत समस्याओं, युवाओं की मनोदशा, और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।

लावण्य प्रेम (भाग-2)

वह बंगला भव्य और विशाल तो नहीं था, किन्तु साधारण भी नहीं था। दरअसल, उसे फार्महाउस कहा जाए तो बेहतर होगा, क्योंकि वहाँ फार्महाउस जैसी तमाम सुविधाएँ मौजूद थीं। साथ ही वह शहर से दूर, एक वीरान इलाके में बना हुआ था, जो चारों तरफ ऊँची बाउंड्री वाल से घिरा हुआ था।
गेट पर मुस्तैदी से खड़े दो गनमैन अपनी निगाहें चारों ओर घुमाकर उस बंगले की निगरानी कर रहे थे। बाउंड्री वाल के अंदर एक ओर सुंदर स्विमिंग पूल था, दूसरी ओर रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ, और पीछे की ओर आम का घना बगीचा। बीच में खड़ा था वह तीन मंज़िला बंगला — शायद उसे कुछ पल शांति से बिताने के लिए बनवाया गया था, और यही हो भी रहा था।

बंगले के भीतर, हॉल में इस समय पाँचों लड़के आराम से बैठे हुए थे। पाँचों ही आकर्षक व्यक्तित्व वाले थे, जिनका वेशभूषा बताती थी कि वे किसी अमीर परिवार का प्रतिनिधित्व करते थे। उनकी आँखों में अपने धन-संपत्ति और सामाजिक ताकत का गुरूर साफ झलकता था। किन्तु इस समय उनके चेहरों पर एक अजीब-सी शांति थी।
उनके हाव-भाव से नहीं लगता था कि उन्हें किसी बात की जल्दी हो। वे निश्चिंत थे — क्योंकि इस बंगले के मालिक शिशिर ने ही उन्हें बुलाया था। और वे सब जानते थे कि शिशिर वादे का पक्का है; उसने अगर किसी बात की हामी भर दी, तो उसे पूरा करने के लिए वह पूरी ताकत झोंक देगा।

लेकिन जिसने उन्हें बुलाया था, वही अब तक नदारद था। ऐसे में उनकी निगाहें बार-बार बंगले के गेट की ओर उठ जाती थीं। धीरे-धीरे आगे बढ़ती घड़ी की सुई और शिशिर के न आने से उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। तभी उनमें से एक लड़का — प्रणव — बाकी चारों की ओर देखकर बोला,
“यार प्रितेश!… लगता है शिशिर के लिए समय का कोई मूल्य नहीं है।”

प्रितेश, जो उसकी बात सुनकर थोड़ा चौंक उठा था, बोला —
“ऐसा तुम किन तथ्यों पर कह रहे हो? आखिर कहना क्या चाहते हो, स्पष्ट कहो। इस तरह से बातों को घुमा-फिराकर कहोगे, तो मैं कुछ नहीं समझ पाऊँगा।”

प्रणव हल्के से मुस्कराया, फिर गंभीर होकर बोला —
“यार, उसने क्या कहकर हमें बुलाया था?… यही न, कि मेरे फार्महाउस पर जल्द से जल्द पहुँचो। मैं भी वहीं आ रहा हूँ। वहाँ पहुँचकर ही हमारी बातें होंगी और पार्टी भी करेंगे।
बस, श्रीमान का हुक्म हुआ और हम सब दौड़े-दौड़े आ गए। हमें यहाँ आए हुए घंटे भर से ज़्यादा हो गया, पर बुलाने वाले महाशय का तो अब तक अता-पता नहीं!”

तभी तीसरा लड़का विप्लव बोल पड़ा —
“हां, तुम्हारी बात सोलह आने सच है। उसने कहा और हम लोग दौड़कर आ गए, लेकिन खुद ही अब तक नहीं पहुँचा। इससे साफ़ है कि उसकी नज़रों में समय का कोई मूल्य नहीं।”

वह इतना ही कह पाया था कि तभी बाहर किसी गाड़ी के आने की आवाज़ गूँजी। जिन चेहरों पर कुछ क्षण पहले तक नाराज़गी झलक रही थी, वे चेहरे अब खिल उठे। क्योंकि वे समझ गए — अब शायद शिशिर ही आया होगा।

हुआ भी वही। पाँच मिनट बाद ही बड़ा-सा थैला उठाए हुए शिशिर ने गेट से प्रवेश किया और सीधे उनकी ओर बढ़ा।
शिशिर का शरीर गठीला था; झील-सी नीली आँखें, घुंघराले काले बाल, चौड़ा ललाट और गौर वर्ण वाला गोल चेहरा — और उस पर उसकी चिर-परिचित मुस्कान।
आते ही उसने सबकी ओर देखकर सधे हुए स्वर में कहा —
“प्रिय मित्रों! जानता हूँ, मैं देर से आया हूँ और आप लोग पहले से पधार चुके होंगे। इंतज़ार करना हमारे खून में नहीं, और हम टीन-एज हैं — तो किसी का भी इंतज़ार हमें रास नहीं आता। फिर भी आपको प्रतीक्षा करनी पड़ी…”

वह कुछ पल रुका, सबकी आँखों में देखा, फिर मुस्कराकर बोला —
“जानता हूँ, आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि आगे क्या करेंगे। तो बता दूँ — अभी हम लोग ज़ोरदार पार्टी करेंगे और उस घमंडी लड़की के लिए आपस में एक ‘अलिखित अनुबंध’ करेंगे।”

“क्या?” — प्रणव आश्चर्य से बोल पड़ा।
वह कुछ देर तक शिशिर के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता रहा, फिर बोला —
“यार शिशिर!… तुम बातों को इतनी गोल-गोल क्यों घुमा रहे हो? साफ़-साफ़ बताओ, आगे क्या प्लानिंग की है?”

शिशिर मुस्कराया —
“हाँ, प्लानिंग तो की है, और उसी कारण तुम सबको बुलाया है। लेकिन अपनी बात बताने से पहले पार्टी की तैयारी कर लेते हैं। फिर जाम टकराएँगे और उसी दौरान उस विषय पर भी चर्चा करेंगे, जिसके लिए हम सब यहाँ इकट्ठा हुए हैं।”

“तुम भी न यार!… बिना मतलब की भूमिका बाँध रहे हो,” प्रितेश झुंझलाया। “अरे बताओ भी, हम लोगों को क्यों बुलाया है? पार्टी तो होती रहेगी।”

पर उसकी बातों का शिशिर पर कोई असर नहीं हुआ। वह अपने साथ लाए थैले को उठाता है, सबके चेहरों पर जिज्ञासा और बेचैनी देखता है, हल्का मुस्कराता है और सीधे किचन की ओर बढ़ जाता है।

वह बंगला भव्य और विशाल तो नहीं था, किन्तु साधारण भी नहीं था। दरअसल, उसे फार्महाउस कहा जाए तो बेहतर होगा, क्योंकि वहाँ फार्महाउस जैसी तमाम सुविधाएँ मौजूद थीं। साथ ही वह शहर से दूर, एक वीरान इलाके में बना हुआ था, जो चारों तरफ ऊँची बाउंड्री वाल से घिरा हुआ था।
गेट पर मुस्तैदी से खड़े दो गनमैन अपनी निगाहें चारों ओर घुमाकर उस बंगले की निगरानी कर रहे थे। बाउंड्री वाल के अंदर एक ओर सुंदर स्विमिंग पूल था, दूसरी ओर रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ, और पीछे की ओर आम का घना बगीचा। बीच में खड़ा था वह तीन मंज़िला बंगला — शायद उसे कुछ पल शांति से बिताने के लिए बनवाया गया था, और यही हो भी रहा था। बंगले के भीतर, हॉल में इस समय पाँचों लड़के आराम से बैठे हुए थे। पाँचों ही आकर्षक व्यक्तित्व वाले थे, जिनका वेशभूषा बताती थी कि वे किसी अमीर परिवार का प्रतिनिधित्व करते थे। उनकी आँखों में अपने धन-संपत्ति और सामाजिक ताकत का गुरूर साफ झलकता था। किन्तु इस समय उनके चेहरों पर एक अजीब-सी शांति थी। उनके हाव-भाव से नहीं लगता था कि उन्हें किसी बात की जल्दी हो। वे निश्चिंत थे — क्योंकि इस बंगले के मालिक शिशिर ने ही उन्हें बुलाया था। और वे सब जानते थे कि शिशिर वादे का पक्का है; उसने अगर किसी बात की हामी भर दी, तो उसे पूरा करने के लिए वह पूरी ताकत झोंक देगा। लेकिन जिसने उन्हें बुलाया था, वही अब तक नदारद था। ऐसे में उनकी निगाहें बार-बार बंगले के गेट की ओर उठ जाती थीं। धीरे-धीरे आगे बढ़ती घड़ी की सुई और शिशिर के न आने से उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। तभी उनमें से एक लड़का — प्रणव — बाकी चारों की ओर देखकर बोला,
“यार प्रितेश!… लगता है शिशिर के लिए समय का कोई मूल्य नहीं है।”
प्रितेश, जो उसकी बात सुनकर थोड़ा चौंक उठा था, बोला —
“ऐसा तुम किन तथ्यों पर कह रहे हो? आखिर कहना क्या चाहते हो, स्पष्ट कहो। इस तरह से बातों को घुमा-फिराकर कहोगे, तो मैं कुछ नहीं समझ पाऊँगा।”
प्रणव हल्के से मुस्कराया, फिर गंभीर होकर बोला —
“यार, उसने क्या कहकर हमें बुलाया था?… यही न, कि मेरे फार्महाउस पर जल्द से जल्द पहुँचो। मैं भी वहीं आ रहा हूँ। वहाँ पहुँचकर ही हमारी बातें होंगी और पार्टी भी करेंगे।
बस, श्रीमान का हुक्म हुआ और हम सब दौड़े-दौड़े आ गए। हमें यहाँ आए हुए घंटे भर से ज़्यादा हो गया, पर बुलाने वाले महाशय का तो अब तक अता-पता नहीं!”
तभी तीसरा लड़का विप्लव बोल पड़ा —
“हां, तुम्हारी बात सोलह आने सच है। उसने कहा और हम लोग दौड़कर आ गए, लेकिन खुद ही अब तक नहीं पहुँचा। इससे साफ़ है कि उसकी नज़रों में समय का कोई मूल्य नहीं।”
वह इतना ही कह पाया था कि तभी बाहर किसी गाड़ी के आने की आवाज़ गूँजी। जिन चेहरों पर कुछ क्षण पहले तक नाराज़गी झलक रही थी, वे चेहरे अब खिल उठे। क्योंकि वे समझ गए — अब शायद शिशिर ही आया होगा।
हुआ भी वही। पाँच मिनट बाद ही बड़ा-सा थैला उठाए हुए शिशिर ने गेट से प्रवेश किया और सीधे उनकी ओर बढ़ा।
शिशिर का शरीर गठीला था; झील-सी नीली आँखें, घुंघराले काले बाल, चौड़ा ललाट और गौर वर्ण वाला गोल चेहरा — और उस पर उसकी चिर-परिचित मुस्कान।
आते ही उसने सबकी ओर देखकर सधे हुए स्वर में कहा —
“प्रिय मित्रों! जानता हूँ, मैं देर से आया हूँ और आप लोग पहले से पधार चुके होंगे। इंतज़ार करना हमारे खून में नहीं, और हम टीन-एज हैं — तो किसी का भी इंतज़ार हमें रास नहीं आता। फिर भी आपको प्रतीक्षा करनी पड़ी…”
वह कुछ पल रुका, सबकी आँखों में देखा, फिर मुस्कराकर बोला —
“जानता हूँ, आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि आगे क्या करेंगे। तो बता दूँ — अभी हम लोग ज़ोरदार पार्टी करेंगे और उस घमंडी लड़की के लिए आपस में एक ‘अलिखित अनुबंध’ करेंगे।”
“क्या?” — प्रणव आश्चर्य से बोल पड़ा।
वह कुछ देर तक शिशिर के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता रहा, फिर बोला —
“यार शिशिर!… तुम बातों को इतनी गोल-गोल क्यों घुमा रहे हो? साफ़-साफ़ बताओ, आगे क्या प्लानिंग की है?”
शिशिर मुस्कराया —
“हाँ, प्लानिंग तो की है, और उसी कारण तुम सबको बुलाया है। लेकिन अपनी बात बताने से पहले पार्टी की तैयारी कर लेते हैं। फिर जाम टकराएँगे और उसी दौरान उस विषय पर भी चर्चा करेंगे, जिसके लिए हम सब यहाँ इकट्ठा हुए हैं।”
“तुम भी न यार!… बिना मतलब की भूमिका बाँध रहे हो,” प्रितेश झुंझलाया। “अरे बताओ भी, हम लोगों को क्यों बुलाया है? पार्टी तो होती रहेगी।”
पर उसकी बातों का शिशिर पर कोई असर नहीं हुआ। वह अपने साथ लाए थैले को उठाता है, सबके चेहरों पर जिज्ञासा और बेचैनी देखता है, हल्का मुस्कराता है और सीधे किचन की ओर बढ़ जाता है।