डॉ मोहन लाल अरोड़ा

मै एक छोटा सा डाक्टर हमेशा मरीजों के दुख दर्द में रहा और उनकी सेवा मे लगा रहा बदले में मुझे बहुत सारा आशीर्वाद प्यार और धन के इलावा इज्जत और नाम भी मिला। समाज सेवा में जुड़े और सम्माननीय लोगों से मिलना हुआ, लिखने और बोलने का मौका मिला। जिसको मैने दिल से स्वीकार किया और कलम पकड़ कर अपने दिल से लिख डाला। आज आपलोगों के बीच एक कवि के रूप में हाजिर हूँ। दुख और दर्द से दिल का नाता है, इस लिए दर्द भरी रचना मन से लिखी जाती है। आप पसंद करते हैं तो हमारी कलम की धार भी तेज होती हैं और अपनी लेखनी को सफल बनाती है।

जीने की राह

लीजा सरकारी अस्पताल हिसार में स्टाफ नर्स की पोस्ट पर कार्यरत थी।अपने कार्य के प्रति समर्पण और मृदुल स्वभाव की वजह से अस्पताल में सभी मरीजों और डाक्टर की चहेती थी। सभी उस का सम्मान करते थे।उसी अस्पताल में ही कार्यरत फार्मासिस्ट इब्राहिम से उसकी शादी हो जाती है दो साल में एक बेटा भी हो जाता है ..हँसी-खुशी कब दस साल निकल गए पता ही नही चला। बेटा स्कूल जाने लगा …लीजा और इब्राहिम अपनी अपनी डयूटी करते रहे।

दोनों इस बार क्रिसमस मनाने के लिए दिल्ली का प्रोग्राम बनाते हैं और अपनी गाड़ी से बेटे को लेकर यात्रा पर निकल पड़ते हैं.. दिल्ली पहुँच कर क्रिसमस मनाते है और दो दिन दिल्ली घूम कर वापिस आ रहे होते है कि अचानक गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है। सड़क दुर्घटना में इब्राहिम और बेटे की मौत हो जाती हैं ….लीजा को रोहतक स्थित पी जी आई मे भर्ती किया जाता है। कुछ दिनों में लीजा को होश आता है तो अपने बेटे और पति के बारे में पूछती तो तसल्ली बख्श जवाब नहीं मिलता है ….लीजा परेशान और मायूस हो कर इधर उधर भागती है ..डाक्टर के पास जाकर अपने स्टाफ नर्स होने का परिचय देती हैं तो डाक्टर उसे आराम से बैठाता हैं …धीरज बंधवाता है और फिर धीरे धीरे बेटे और इब्राहिम की मौत के बारे बताता है ..लीजा तो जैसे पत्थर की मूर्ति बन जाती है !! मै क्यों ना मर गई !… ओह !गॉड… मुझे क्यो जिंदा रखा और बेहोश हो जाती है।

दो तीन दिन के ईलाज के बाद लीजा स्वस्थ हो जाती हैं और हिसार आ जाती हैं परंतु हर वक्त सिर्फ मरने की सोचती है। कही भी उसका मन नही लगता और ना ही कुछ खाने की इच्छा होती है सर्दी की रात में मरने का उपाय सोच रही थी कि अचानक एक छोटा बिल्ली का बच्चा कांपते हुए उसके पैरो के पास धीरे धीरे म्याऊँ म्याऊँ करता है …लीजा बच्चे को देखती हैं जो भूख और सर्दी से काँप रहा था.. लीजा को दया आती है और वो थोड़ा सा गर्म दूध बिल्ली के बच्चे को पिला देती है। बिल्ली का बच्चा दूध पी कर लीजा के पैरों को चाटने लगता है जैसे शुक्रिया अदा कर रहा हो …..यह सब देख कर लीजा बहुत खुश होती है और बच्चे को बड़े ध्यान से देखती हैं और उसे सहलाने लगती है । यह दृश्य लीजा को सोचने पर मजबूर कर देता है कि नेकी और सेवा से किसी की भी जान बचाई जा सकती है…. फिर क्या … लीजा गरीब निसहाय मजबूर लोगों की सेवा में लग जाती है और इस तरह लीजा को जीने की एक नई राह मिल जाती है।