मदन मोहन 'मैत्रेय'

मदन मोहन “मैत्रेय” का जन्म बिहार राज्य के दरभंगा अनुमंडल अंतर्गत रतनपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद आपने शिक्षा प्राप्त की और साहित्य के प्रति आपकी ललक बाल्यकाल से ही परिलक्षित होती रही। यही ललक धीरे-धीरे आपकी पहचान बन गई और ईश्वर की कृपा से वर्ष 2022 में आपकी चार महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन उपन्यास और एक काव्य-संग्रह शामिल है। आपकी लेखनी समाज की ज्वलंत समस्याओं, युवाओं की मनोदशा, और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।

लावण्य प्रेम (भाग-8)

धड़ाम की आवाज़ हुई और पीछे से आती हुई कार उसकी कार से टकराई; उससे कुछ सेकेंड पहले, जब मौत उससे कुछ ही दूरी के फासले पर थी, उसने देख लिया था कि पिछली कार उसे ही हिट करने के इरादे से भागी चली आ रही है। इसलिए उसने पल भर की देरी करना भी मुनासिब नहीं समझा और ड्राइवर साइड के दरवाज़े को खोलकर बाहर छलांग लगा दी।एक तो कार की तेज़ रफ़्तार और ऊपर से आनन-फानन में लिया गया फैसला! विश्वांत कार से बाहर निकलते ही फुटबॉल की भांति हवा में ऊँचा उछला और दूर जा गिरा। स्वाभाविक था कि इस अप्रत्याशित स्थिति के कारण उसे बहुत चोटें आईं।वह कई मीटर तक सड़क पर घिसटता चला गया। इसके बाद उसने देखा कि कारों की टक्कर हो चुकी है; उसकी कार डिवाइडर से टकराकर उछली और फिर धूँ-धूँ कर जलने लगी। इस मंज़र की कल्पना करके ही उसकी रूह काँप गई।

‘उफ़!… इस समय अगर वह कार के अंदर होता तो?’ निश्चित ही उसका कचंबर निकल जाना था। लेकिन अभी भी उसकी स्थिति ठीक नहीं थी। तीव्र गति से सड़क से टकराने के कारण उसे गहरी चोटें आई थीं, जिस कारण संभावित घटना की कल्पना करने के कुछ ही पलों बाद उसकी चेतना लुप्त होने लगी। वह भरसक प्रयास कर रहा था कि चोट को भुलाकर उठ खड़ा हो, किंतु वह ऐसा नहीं कर सका और असह्य वेदना के कारण बेहोश हो गया।उधर, सड़क पर हुए इस भीषण हादसे के बाद पूरे इलाके में डर का माहौल बन गया। हालाँकि, टक्कर मारने के बाद पिछली कार वहाँ से नौ-दो-ग्यारह हो चुकी थी और हादसा होने के बाद वहाँ इकट्ठी हो रही भीड़ ने उस भागती गाड़ी पर ध्यान भी नहीं दिया। उनका पूरा ध्यान तो अगली कार पर था। लोगों को लग रहा था कि कार में सवार व्यक्ति शायद बचा नहीं होगा, किंतु धूँ-धूँ कर जलती हुई कार के ड्राइवर साइड के खुले दरवाज़े को देखकर लोगों को अंदाज़ा हुआ कि शायद ड्राइवर ने समय रहते छलांग लगा दी है।

तभी भीड़ मुस्तैदी से सड़क पर विश्वांत को ढूँढने लगी। वैसे भी जलती हुई कार की लपटों से पूरा इलाका रोशन हो रहा था, इसलिए लोगों को उसे ढूँढने में ज़्यादा परेशानी नहीं हुई। कुछ ही पलों में लोगों की निगाह उस पर पड़ गई। खून से लथपथ विश्वांत को जीवित देखकर लोगों के मन में आशा का संचार हुआ। फिर तो कुछ लोग उसके पास पहुँचे और उसे हिला-डुला कर देखने लगे।इसी बीच भीड़ में से ही किसी ने इमरजेंसी नंबर डायल कर दिया। सड़क पर लोगों की चहल-पहल बढ़ती जा रही थी और कुछ ही देर में पुलिस की टीम और एम्बुलेंस वहाँ पहुँच गई। इसके तुरंत बाद विश्वांत को एम्बुलेंस में डालकर हॉस्पिटल ले जाया गया, जबकि पुलिस वाले घटनास्थल का निरीक्षण करने और लोगों से इस बारे में ज़रूरी पूछताछ करने में जुट गए।उधर, विश्वांत के पिता राघव राय को जब इस घटना की जानकारी मिली, तो उनके होश उड़ गए। बिजनेसमैन राघव राय अपना पूरा समय अपने कारोबार को ही देते थे, तभी तो उन्होंने अकूत संपत्ति बनाई थी। यही कारण था कि परिवार के लिए उनके पास समय नहीं रहता था, खासकर अपने बेटे के लिए। उनको यह भी पता नहीं रहता था कि उनके कुल का इकलौता वारिस आखिर करता क्या है।

उनका मानना था कि वे कमा रहे हैं और बेटे को मनमुताबिक खर्च करने के लिए पैसे दे रहे हैं, बस उनकी ज़िम्मेदारी यहीं खत्म हो जाती है। वैसे भी, वह अभी यंग है, अपने हिसाब से जिएगा और आगे चलकर तो उसे बिज़नेस में आना ही है; इसलिए उसके निजी जीवन में दखलंदाज़ी क्यों करना?

लेकिन जैसे ही उन्हें इस हादसे की खबर मिली, उनके हाथों के तोते उड़ गए। पल भर में ही उनका आकर्षक और रोबीला व्यक्तित्व फीका पड़ गया। तब उन्हें अहसास हुआ कि उन्होंने अपने घर के चश्मों-चिराग को कुछ ज़्यादा ही आज़ादी दे दी थी, जिसका खौफनाक परिणाम आज उनके सामने खड़ा था। लेकिन अब घटना घटित हो चुकी थी, इसलिए इस विषय पर माथापच्ची करने से फिलहाल कुछ होने वाला नहीं था।वे अपनी रोती-बिलखती हुई श्रीमती जी को लेकर तुरंत हॉस्पिटल के लिए निकल पड़े। हालाँकि, रोने का मन तो उनका भी कर रहा था, क्योंकि विश्वांत उनके जिगर का टुकड़ा था, किंतु फिलहाल रोने-धोने से कुछ हासिल नहीं होने वाला था। इसलिए अपने घबराए हुए मन को बार-बार ढाँढस बंधाते हुए वे पूरी रफ़्तार से सड़क पर कार दौड़ाए जा रहे थे।

उधर, विश्वांत को पराशर हॉस्पिटल लाया गया। हॉस्पिटल की नर्सों और वार्ड बॉय ने तेज़ी से उसे स्ट्रेचर पर लादा और आईसीयू (ICU) की ओर दौड़ पड़े। चूँकि मामला हाई-प्रोफाइल था, इसलिए हॉस्पिटल प्रशासन कोई रिस्क (Risk) नहीं लेना चाहता था।इस सब से इतर, स्ट्रेचर पर लेटा हुआ विश्वांत अधखुली आँखों से इधर-उधर देख रहा था और कुछ अलग ही सोच रहा था। वह जानता था कि उसे उतनी ही चोट लगी है, जिससे वह कुछ ही दिनों में रिकवर कर लेगा, इसलिए उसे अपनी शारीरिक चोट की बिल्कुल भी चिंता नहीं थी। उसे तो बस इस बात की फिक्र थी कि उसके चोटिल होने की खबर सुनकर मालती वहाँ आती है या नहीं?

वह उस खौफनाक हादसे को भी भूल चुका था, जो कुछ पल पहले उसके साथ घटित हुआ था। वह यह बात पूरी तरह दिमाग से निकाल चुका था कि कुछ देर पहले उसे जान से मारने की कोशिश की गई है। उसे बस इतना याद था कि मालती कितनी खूबसूरत है। वह चाहता था कि इस घटना की जानकारी मालती को जैसे ही मिले, वह दौड़ी चली आए; और वह उसके चेहरे पर उभरने वाले फिक्र के भावों और भावनाओं के सैलाब को महसूस करना चाहता था।वह चाहता था कि जिसके लिए उसका दिल मचल उठता है, जब उसे इस हादसे का पता चले, तो उसके अंदर भी जज़्बात उफान मारें; तभी तो प्रेम का अंकुर उसके भीतर भी फूटेगा। वह जो लगाव मालती के लिए महसूस करता था, चाहता था कि वैसा ही जुड़ाव मालती के दिल में भी पैदा हो जाए। इसी चाहत के कारण, शरीर में असह्य वेदना होने के बावजूद उसने अपनी चेतना को संभालकर रखा था।हालाँकि, उसे अपने मम्मी-पापा का करुण-क्रंदन सुनाई दे रहा था। उनका व्याकुल होकर उसे पुकारना और बदहवास होकर उसके स्ट्रेचर के साथ तेज़ी से भागना—वह महसूस कर सकता था कि माता-पिता उसे लेकर कितने परेशान हैं। किंतु उसे इन बातों से कोई खास सरोकार नहीं था, क्योंकि वह समझता था कि इकलौता चिराग होने के नाते उनका ऐसा बर्ताव करना तो स्वाभाविक ही है।बात तो तब बनती, जब मालती दौड़ी हुई चली आती! वह उसके शरीर पर लगी चोटों को देखकर बेचैन होती, उसे होश में लाने की कोशिश करती और उससे बात करने का प्रयत्न करती। सिर्फ इसी एक आस में वह अपना होश संभाले हुए था। लेकिन वह कब तक टिकता?… धीरे-धीरे समय आगे बढ़ रहा था और उसी रफ़्तार से उसका दर्द भी बढ़ता जा रहा था। आखिरकार वह ज़्यादा देर तक अपनी चेतना को काबू में नहीं रख सका और पूरी तरह बेहोश हो गया।