सीमाएं हैं ज़रूरी
धीरे-धीरे यथार्थ की राह पकड़,
हर छलावे से खुद को दूर कर।
सपनों के जाल से बाहर निकल,
सच की ज़मीन को महसूस कर।
जब हम पहचानने लगे हदें खुद की,
नापी जा सकती सीमाएं स्नेह से भी।
यह खुदगर्ज़ी नहीं, है आत्म-सम्मान,
कुछ मर्यादा होती हर एक रिश्ते की।
हर दरवाज़ा दस्तक नहीं माँगता,
पर हर चौखट पर आदर ज़रूरी।
मौन की भाषा गर पढ़ना सीख लो,
जीवन में बनी रहे तभी सदा खुद्दारी।
अपने दिल की सुनो, पर धैर्य रखो,
खामोशी भी कहती है अपनी गाथा।
जब मौन को मिल जाए संवाद कोई,
बन पाए ज़िंदगी में अटूट एक नाता।
