थोड़ी-सी सहानुभूति
ज़िंदगी उतनी उलझी हुई कहाँ थी,
जितनी लोगों ने अब उलझा है दी।
समझने की करे कोई ज़रा कोशिश,
क्या सही है, कहाँ हो रही गलती।
सभी उलझे हैं अपने ही दायरे में,
हर फ़ैसला बस पसंद-नापसंद का।
किसी को वक़्त नहीं ठहर के सोचे,
दिल से ज़रा समझे दर्द दूसरे का।
कोई किसी की सुनना चाहे कहाँ,
हर कोई बोले बस अपनी बात।
अपनी सोच को सब ठहराएं सही,
अंदर ना आने दे औरों की बात।
ना सब कुछ सही, ना सब ग़लत,
हालात से बदलते रहते सारे रंग।
सब इधर से उधर बस घूम ही रहे,
दो सिरों के बीच जैसे लटकी पतंग।
जब कोई ना समझ सके मनोदशा,
मिल न पाए अपनों का भी साथ।
हर बार कसौटी पर उतरना पड़े खरा,
तब समझौता या फिर होती बगावत।
जब भी मिले कोई टूटा हुआ सा,
अगर न बन पड़े कुछ कहने को भी,
बस थोड़ा-सा अपनापन दिखा देना,
कहीं चाह जग जाए फिर जीने की।
