एहसास

कुछ छूट रहा कहीं,
मालूम नहीं क्या,
बस भाग रही,
समय के साथ ज़िंदगी भी,
किसी के पास समय नहीं,
सब अपने में हैं खोए।

चाहत है सबको कुछ पाने की,
ख़्वाहिशें, जो कभी पूरी ही नहीं होतीं,
यह लोगों को रुकने भी नहीं देती,
सब बस चलते जा रहे,
एक अनजानी भीड़ का हिस्सा बन,
और खुद से ही दूर होते जा रहेI

सब मानो आगे बढ़ रहे,
मंज़िल का किसी को पता नहीं,
क्योंकि मंज़िल अगर मालूम होती,
तो यह यात्रा कहीं तो जाकर रुकती,
जीवन में संतोष होता,
पर नहीं…

जो है या मिल गया,
वो चाहिए नहीं,
जो मिला नहीं, या मिल नहीं सकता,
उसको पाने की है ज़िद,
यह ज़िद…
इंसान को इंसान रहने नहीं दे रही।

कहाँ जाकर तलाश पूरी होगी,
इसकी ख़बर अगर है नहीं,
रुक कर देखो तो सही,
शायद मंजिल हो,
तुम्हारे कदमों तले ही,
और तुम्हें एहसास ही नहीं।
और तुम्हें एहसास ही नहीं।