जी भर के मुफ़लिसों को रुलाया है आपने
जी भर के मुफ़लिसों को रुलाया है आपने
बस बेबसों के सर को झुकाया है आपने।
गंगा नहा के पाप कभी धुल न पाएगा
विधवा के घर का दीप बुझाया है आपने।
पंछी हुआ शिकार ये गोली से आपकी
क्यों रब से दुश्मनी को निभाया है आपने।
ज़न्नत करूँ क़बूल नहीं क्या हुआ मुझे
इक जाम क्या नज़र से पिलाया है आपने।
शिकवे भुलाए फ़र्ज़ से ग़ाफ़िल नहीं हुए
रूठे हुओं को फिर से मनाया है आपने ।
