उसे पाने को बेघर हो गए हैं

उसे पाने को बेघर हो गए हैं
हदों से अपनी बाहर हो गए हैं।

रहमदिल कल तलक़ जो भी रहे थे
सुना है सब सितमगर हो गए हैं।

मेरे ज़ख्मों पे मरहम के बहाने
तुम्हारे बोल नश्तर हो गए हैं।

कभी मिलने नहीं आते हैं ज़ालिम
महज़ वादे मुक़र्रर हो गए हैं।

चलो बेनाम निकलो इस नगर से
यहाँ के लोग पत्थर हो गए हैं।