नख़रे अब सनम के बढ़े जा रहे है

नख़रे अब सनम के बढ़े जा रहे है,
बिना बात फ़बते कसे जा रहे है !

सितम का सितमगर के आलम है ऐसा,
दिनों-दिन, वो सिर पर, चढ़े जा रहे है !

बहाना हमेशा नया ढूंढ़कर वो,
कभी भी, कहीं भी, लड़े जा रहे है !

हक़ीक़त से नाता नहीं दूर तक पर,
फ़साने नए नित गढ़े जा रहे है !

नहीं कोई मुद्दा लड़ाई का लेकिन,
वो बेबात फिर भी अड़े जा रहे है !

शिकायत किसी से क्या अब करे हम,
बचे बाल सर के झड़े जा रहे है !

गए हार हम तो मनाते-मनाते,
‘धरम’ से मगर वो भिड़े जा रहे है!!