ग़म-ए-गागर पुरानी फोड़ आए हम, धर्मेंद्र कुमार निवातिया ग़म-ए-गागर पुरानी फोड़ आए हम,गुमाँ लहरों का भी सब तोड़ आए हम!तूफानों संग लड़ना बन गई आदत,दिशा लहरों की यारों मोड़ आए हम !फ़िज़ाओं ने फैलाया महकता आँचल,गुलों ने जब पुकारा दौड़ आए हम !डरायेगा भला कोई क्या हमको कजा से आज रिश्ता जोड़ आए हम !हमे अब डर नहीं लगता किसी ग़म से,किनारे दुःख की कश्ती छोड़ आए है !!