तुम जो रूठे राम हैं रूठे जीवन के सब कम हैं रूठे धरती रूठी अंबर रूठा रूठे चाँद सितारे सपनों के दीपक रूठे सब रूठे अश्रु के धारे। तुम जो रूठे राम हैं रूठे जीवन के आराम हैं रूठे।
खुद में तुझको देखूँ प्रतिपल फिर भी नैन दरस को तरसें अन्तर्मन के सुमन सूखते स्नेह मेघ को कह दो बरसें।
मधुर मिलन सुखधाम हैं रूठे जीवन के सब काम हैं रूठे। तुम जो रूठे राम हैं रूठे।
ठंडी पवन में तेरी स्मृतियाँ मन के भीतर स्वर भरती हैं टूटे सपनों की पीर लिए निशा–निशा आँखें तरसती हैं । आशा के हर धाम हैं रूठे मन के सब अरमान हैं रूठे तुम जो रूठे राम हैं रूठे । जीवन के सब काम हैं रूठे ।