भीतर तू निहारा कर

अपनी अपनी जिद से पल भर को किनारा कर
मुमकिन है कि बन जाये फिर से बात दोबारा कर ।


मुझको कोई चीज़ समझ न तेरा हूँ तो तेरा ही हूँ
तुझसे दूर नही जाऊंगा कितना भी इशारा कर ।


एक समंदर गहरा दिल है सारे गम पी जायेगा
गम की सारी नदियों को मेरी और पुकारा कर ।


धूप नही जो आंगन में तो सूरज को मत कोसा कर
जुगनू को मनमीत बना दिल में कुछ उजियारा कर ।


सारी फसलें काट चुका जो मिट्टी से मिल आया है
वो जो घर का बूढा है मत उस पर ज्ञान बघारा कर ।


माँ जो कहती है “तू” बेटा, सूरज चंदा तारा है
बातें उसकी झूठी न हो खुद को एक सितारा कर ।


कुछ न हासिल हो, ’विनीत’ तू खुद को पा जायेगा
बाहर से पहले, ग़र अपने भीतर तू निहारा कर ।