तुम्हारी याद का आलम निराला है जगमोहन गौतम 'मुसाफ़िर' तुम्हारी याद का आलम निराला हैदिलों में बस तुम्हारा ही उजाला है। नज़र में तुम सजे हो हर तरफ़ सेख़यालों में तुम्हारा ही मेला है। वो लम्हा जब मुलाक़ात हुई थीदिलों का राग उस पल का नशीला है। तुम्हारी बात में जादू सा बंधा हैहर इक लफ़्ज़ तुम्हारा गीत-माला है। न जाने कैसे दिल को चैन आयातुम्हारी एक झलक ही मरहला है।