सदियों से तय-शुदा महबूब संग-दिल, ख़ुद-ग़रज़, बे-वफ़ा जागती आंखों से शब-ए-फ़िराक़ काटे आशिक़ बा-वफ़ा इश्क़ बस एक प्रतीक्षा ।
ये आशिक़ का मुक़द्दर है या है फ़लसफ़ा अनन्त-दुख में नए-नए रूपकों कष्टों का इज़ाफ़ा आम तजरबात से अलग तकलीफ़-देह कैफ़ियत दुःख भरा इल्तिज़ा इश्क़ बस एक प्रतीक्षा ।
अधूरी बात छूटी रात का सिर्फ़ इंतिज़ार दीदार होता नहीं अपने महबूब के लिए आशिक़ को मिलती तन्हाई और अनंत प्रतीक्षा इश्क़ बस एक प्रतीक्षा ।