भीड़ दहल सहम सी गई सुनकर रावण का एक जोरदार अट्टाहास बंद करो बेवकूफों हर साल मुझे जलाने का ये ढोंग और अंधविश्वास छल, कपट, क्रोध, रोष से भरा मैं दिखा इसलिए दशानन का विनाश तेरे अंदर के राम को है नहीं आभास कितने दुष्कर्मी जीवन और विलास मेरे एक अपहरण पर हर साल क्यों हो रहा जश्न, उन्माद और उल्लास खुलेआम चीरहरण करो तुम हिसाब अबलाओं बच्चियों को नोचता पिशाच इतने सालों क्या अच्छाई की जीत हुई या हुआ किसी राम से बुराई का अंत मेरी आड़ लेकर क्यों हो रहा आडंबर करोगे कब तक राजकोष का नाश।