थार की मिट्टी महेंद्र कुमार गर्ग चमकतीथार की मिट्टीले हवा का सहाराउड़ जाती है दूर-दूर तककण-कण से बदलतीरूप अपना।चलती हवा मेंबिखर जाती हैधीरे सेस्थान अपना बना लेती हैजग से न्यारीथार की मिट्टी ।सानिध्य पासूरज की किरणों कास्वर्ण रूप बना लेती हैथार की मिट्टी ।लोहे जैसीतप जाती हैवीरों की बलिदानीइस भूमि परथार की मिट्टी ।इस भूमि परऊँटो की सवारी हैसारे जग से न्यारी हैथार की मिट्टी ।