जीने का हक महेंद्र कुमार गर्ग है जीने का हकमुझे भी,चलना मेरा जड़ से हैदर्द होता हैमुझे भी,क्यों कर रहे होअंत मेरा।बनाता हूँहरा भरा रूपइस प्रकृति कामैं रोकता हूँप्रदूषण कोजलती धूप मेंछाया बनातामैं एक पेड़ हूँ।बिगाड़ा क्यातुम्हारा मैंने,कर रहे हो जोअंत मेरा।मत करोनष्ट मुझे,सांस लेने में होगाकष्ट तुझे।