अदृश्य प्रलय मोहित त्रिपाठी चल रहा एक अदृश्य प्रलयजो न जग को दृष्टिमान होता,सब सजग मधु रागिनी मेंसुप्त होता लुप्त होता।तड़ित ने भी ठान लियाअब न कोई पात होगा,जब पुरुष का प्रकृति संगफिर नया मधुमास होगा।वात का भी यही निर्णयन चलूँगा साथ मैं अब,झूठी है बयार मलय कीध्यान व आभान है क्या।अंतरिक्ष की शांति केमुदित मन की कांति के,बीज का अंकुरण अवरुद्ध हैकदाचित संजीवनी क्षुब्ध है।