मुझे आज़ाद ज़मीं के पन्नों को पढ़ना है मुहम्मद आसिफ अली मुझे आज़ाद ज़मीं के पन्नों को पढ़ना हैंमुझे भी दीदार-ए-संविधान करना है।ये नफ़रत की राजनीति अब देखी नहीं जातीमुझे भी राजनीति के कुछ हिस्सों को बदलना है।आओ जमकर कहें बुरा जो जितना बुरा हैक्यों हमें भी नफ़रत की आग में जलना है।जिनके बहे लहू उनकी याद नहीं मिटने देंगेबस यही जोश अपने देश में भरना है।क्यों डरें किसी के डराने से अब हमअब तो बस आस्तीन के साँप को डरना है।