आज़ादी का लेकर ख़्याल यही सोचते रहते हैं। कैसे ये अंग्रेज यहाँ पर जान नोचते रहते हैं। देश फ़िक्र में मुब्तिला थे जो अब भी याद रहते हैं। ख़ून से लिखते अपने आज़ादी जो हम आज भारत घूमते रहते हैं। नारेबाजी उन्हें प्यारी थी जिसका हम नाम कमाते रहते हैं। मंजर डूबा जो लहू के अंदर हम भी उनको मनाते रहते हैं।