अब तो जागो

सारे समीकरण
उल्टे हो गए
सारे शास्त्र झूठे
मुक्ति का द्वार
उन्मुक्तता
मुक्त हो जाओ
सपनों से, आकांक्षाओं से
इच्छाओं से
माँगों से… मुक्त
केवल मुक्तता ही
मुक्ति का द्वार है!
विचारों को मुक्त करो
मन को समझने दो
आकाश की उन्मुक्तता
अदृश्य की अपारता
समझो उस पुकार को
अनहद बजते नाद को
नहीं… नहीं….

अब मुक्ति का पाठ
कैद में पढ़ना होगा,
अब प्रकृति की उन्मुक्तता
कारावास की सलाखों से
सीखनी होगी
आकाश की निर्बाधता
झरोखों से समझनी होगी
अब माँ की ममता नहीं
प्रकृति की क्रूरता भी
देखनी होगी,
हाँ यह कलयुग है
तुम परमात्मा तक
पहुँचने से ज्यादा
परमात्मा बनने की
सभी सीमाएँ
लाँघ चुके हो
युग वही है
परिदृश्य बदल चुका है,
तुम्हारी सत्ता
धराशायी
तुम्हारी शक्ति
पंगु
तुम्हारा अस्तित्व
खतरे में
तुम्हारा दम्भ
ध्वस्त
न रावण आया
न कंस
न भस्मासुर आया
न रक्तबीज
बस एक विषाणु
विषाक्त संक्रामक
अदृश्य विषाणु
और तुम
विनष्ट, ध्वस्त, पस्त
अब तो जागो
तुच्छ मानव !!