तुम किताब थी
हाँ तुम किताब थी
हमेशा से
मेरे करीब
मेरे बचपन की
तुतलाती यादों में
मेरी बातों को समझती
समझाती
पूरी दुनिया का ज्ञान
जाने कौन कौन सी
कहानियाँ
पता थी तुम्हें
हर रात एक नई
कहानी की
रूमानी दुनिया दिखाती
सपनों के शहर घुमाती
तारों का महल बताती
हाँ, तुम किताब थी!
दिन भर
घर भर के काम
करती करवाती
गाय का गोबर उठाती
उपले भी बना कर दिखाती
दूध दुहना चारा डालना
कहाँ क्या देना क्या उठाना
कितनी बातें बताती जाती
मेरे नन्हें पैरों के
अनुसरण पर
बलिहारी जाती
हाँ, तुम किताब थी!
तेल मसाले घी का
हिसाब करती
सब्ज़ी दाल रोटी का
संसार बसाती
रसोई घर को ही
पूरा जहां बताती
चूल्हे चौके की
खुशबू से
पूरा घर महकाती
हाँ, तुम किताब थी!
जाने कब थामी
तुम्हारे हाथ ने मेरी
उँगली थी
कभी मंदिर कभी स्कूल
जाने कहाँ कहाँ घूमी थी
तुम्हारे दिखाए रास्ते
आज भी पावन हैं
तुलसी के दिए भी
आज तक रोशन हैं
सदियों के इतिहास का
तुम्हारे संग नाता था
हर पर्व हर त्यौहार
तुमसे प्राण पाता था
मेरे मन का हर कोना
हर आँगन महकाती
माँ, तुम किताब थी !
