शहीद ऊधम सिंह
जब भारत माँ की मिट्टी को, नापाक किया अंग्रेज़ों ने,
हर बच्चे बूढ़े मानस को, रौंद दिया अंग्रेज़ों ने।
दानव का अवतार लिए वो, गोरा डायर आया था,
पावन दिन बैसाखी को जब, खूनी सरित बहाया था।
बैठा था तू एक डाल पर, छुपा हुआ था पातों से,
देखा खेल मौत का तूने, आहत था बस घातों से।
जाने क्या समझा था तूने, जाने क्या बस जान लिया,
नहीं छोड़ा उस डायर को, मन में तुमने ठान लिया॥
माँ का बेटा सच्चा था तू, मन में दर्द समाया था,
उधम सिंह नाम था तेरा, कठिन समय अब आया था।
कोई साथ नहीं था तेरे, घर परिवार गंवाया था,
पैसा ढेला हाथ नहीं था, कैसा जीवन पाया था।।
पत्थर किया कलेजा तुमने, जरा भी न घबराया था,
चला अकेला कहरिल लड़ने, तूफानों को जाया था।
जाने क्या क्या कष्ट सहेरे, पैसा कहाँ कमाया था,
धरती पर गोरों को तूने, प्रण को सच्चा बनाया था॥
सालों बीते, सालों गुज़रे, वक़्त नहीं वो आया था,
कैसा जीवट दिया खुदा ने, धैर्य नहीं गंवाया था।
एक मरा बीमारी से जब, दो ने जीवन पाया था,
बाईस साल बीत गए पर, समझ नहीं कुछ आया था॥
भाषण देने पहुंचे दोनों, सही वक़्त अब पाया था,
चूक कोई नहीं थी तुमने, हृदय को मार गिराया था।
की प्रतिज्ञा ऐसी थी तुमने, जीवन होम बनाया था,
क्या करते खिसियाये गोरे, फांसी तुम्हें चढ़ाया था॥
एक गुज़ारिश करती तुमसे, चाहो तो पूरी करना,
माता कभी बनूँ मैं तेरी, कोख मेरी हरी करना।
