मेरी सखी
मैं और मेरी सखी
काव्यांजलि
अक्सर ही बातें करते हैं
पूछते हैं खुद से
हमारे अपने ही क्यों
हम से रूठा करते हैं…
रोज उठते हैं हम
अलसुबह
एक दूसरे को
सुप्रभात करते हैं
जाने क्यों लोग
बस हमें से
जला करते हैं।
मैं और मेरी सखी
काव्यांजलि
अक्सर ही बातें
करते हैं…।
सीखा है मैंने यहाँ
चलना
छन्दबद्ध सृजन
और निःदोष रचना
काव्य का मुस्का कर
भीतर उतरना
मन की तड़प से
शब्द अंतःरिप
रचना…
फिर क्यों आँखों में
आँसू भरा
करते हैं…
मैं और मेरी सखी
काव्यांजलि
अक्सर ही
बातें करते हैं…।
सखी तुम्हारा
जन्मदिन आया
पटल पर मेह
खुशियों का छाया..
बना रहे
नवीन राकेश का साया
फूले फले
मेरी सखी की माया
आओ सब मिल कर
बस यही
दुआ करते हैं
मैं और मेरी सखी
काव्यांजलि
अक्सर ही
बातें करते हैं…।
