नन्हीं चिड़िया

कौआ कबूतर तोते से
भरा हुआ है आसमान
नन्हीं मुट्ठी चूं-चूं करती
भूलो अब चिड़िया का नाम।
सुबह सवेरे उठ जाती थी
चूं-चूं कर सब को जगाती थी,
जाने क्या कहती जाती थी
भूल गए उस समय का भान,
याद आया क्या चिड़िया का नाम?

चिड़िया हमसे क्या लेती थी
कीड़े मकोड़े सब चुन लेती थी
थोड़े बहुत अनाज के दाने
कुछ रोटी के टुकड़े पाने
तिनके छिलके चिथड़े पुराने
बस इतना सा था उसका दाम
हाय कहां है
अब चिड़िया का नाम!

शहर फैलकर बिखर रहा है
खेत-खलिहान सब निगल रहा है
चिड़िया भटककर मर रही है
घर में भी अब घर नहीं है
कहां मांगा था उसने दान
भूल जाओ अब चिड़िया का नाम।

पांखें सैर डरे हुए हैं
सहमें से सब खड़े हुए हैं
कौन कहां कब लील ले जाये
मानव सारे भील से हैं
सम्हल जाओ अब समय नहीं है
क्यों भूले मानव के काम
अब तो ले लो चिड़िया का नाम।