नश्वरता

कंकाल हो जाना कला है।
जीवन की मृत्युशैया पर लेटे
इच्छामृत्यु का वरदान नहीं मिलता।
‘अश्वत्थामा हतो हतः’ – अर्धवाक्य
भ्रम के लिए गढ़े जाते हैं।
अपना उद्धार स्वयं करना होता है
मुक्ति के रास्ते नहीं मिलते।
भक्ति का भाव अर्थहीन लगता है।
मन की कोई तृप्ति नहीं होती
जीवन का गद्य गीता नहीं होता
सब कुछ भ्रम है।
सच में एक दूसरी दुनिया भी जरूरी है।