रक्तबीज
मेरी देह पिंजरे में है,
मेरा मन ब्रह्मांड में।
सुनाई देती रही घुँघरुओं की छम–छम,
करते रहे मेरा मति–भ्रम।
सदियों से कुछ वाक्यों की पुनरावृत्ति होती रही है–
स्त्रियों! पर्दा करो।
स्त्रियों! पैदा करो।
स्त्रियों! सहा करो।
स्त्रियों! देवी बनो।
स्त्रियों! स्त्री रहो।
घर की दीवार पर नहीं
माथे पर बना लूँगी स्वास्तिक
चारों दिशाओं से हो जाऊँगी मुक्त
टाल दूँगी सारे द्वंद्व–युद्ध
निकल आऊँगी शास्त्रों से बाहर
ढूंढ़ लूँगी अपना ग्रह
बन जाऊँगी बुद्ध
खा जाऊँगी उन्हें
बने अगर रक्तबीज।
