प्रेम

वह प्रेम की बाल्यावस्था थी
जब दो मनुष्य गिरे थे प्रेम में
चिंतामुक्त
भयमुक्त
आकाश छत था
धरती आँगन
नापने के लिए संपूर्ण पृथ्वी। 

प्रेम तब बूढ़ा हो चला
जब संवाद अपवाद बन गए
कम पड़ गई
चुम्बन की तीव्रता
बच गई
दो भारी देह
स्पर्श हीन
कौतूहलहीन
नहीं रहे मनुष्य
प्रेम अपनी आत्मा छोड़कर
देह में धँस गया था
या अलौकिक हो गया था
सृष्टि में सब लौकिक होकर भी पुनः अलौकिक हो जाता है
दो भले मनुष्य
स्त्री-पुरुष में बदल गए
अकस्मात् हमें ज्ञात हुआ
हम कितने किलो का माँस है
जो सालों से एक-दूसरे का ढोते आ रहे हैं।