सिगरेट-शराब पीते समय दोस्तों ने कहा कुछ नहीं होता झूठ बोलते मर्यादाएँ लाँघते बेईमानी करते समय आया था पाप-पुण्य सही-गलत का ध्यान लेकिन शनैः-शनैः सब सहज होता गया विरोध और विरोधाभास समाप्त हो चुके थे जीवन निजी,सावर्जनिक और गुप्त में बँट चुका था अनन्तः उस बिंदु पर थी जहाँ सही-गलत पीछे छूट गए थे मैं अपने बारे में क्या लिखती क्या बताती,क्या छिपाती चाहती तो सब किया धरा समय पर डाल देती पर कैसे कहती एक कलयुग घट रहा है बाहर और एक मेरे भीतर भी।