अच्छा है क्या
कभी बात करना तुम खुद से,
खुद ही खुद को खुद से आखिर
क्यों तनहा सा कर रखा है,
अच्छा है क्या ?
प्यार किया था तुमने भी पर,
कुछ बंधन थे, याद नहीं क्या?
कुछ कस्मे थीं, कुछ वादे थे,
पुरे थे कुछ, कुछ आधे थे,
कुछ वियोग के सपने भी थे,
वो वियोग भी तो आना था,
अब उसके आ जाने पर तुम,
कस्मे वादे भूल रहे हो,
अच्छा है क्या?
रुसवा होना था गर ऐसे,
फिर क्यों अबतक रखा छुपाकर,
जो मन में था उसको मन में,
फिर क्यों अबतक रखा दबाकर,
क्या लगता था,
जीत तुम्हारी हो जायेगी,
हार रहे जब अपनी बाजी,
छोड़ के चौसर ऐसे जाना,
अच्छा है क्या ?
इस समाज के नियम कायदे,
से ही सजे हमारे जेवर,
विद्रोही तो नहीं हुए थे,
पहले कभी हमारे तेवर,
नियति नियत है, इसी नियम को,
मान लिया था अपनी मंजिल,
सारे नियम तोड़कर करना,
चाह रहे हो जीत सुनिश्चित,
अच्छा है क्या ?
