स्वतंत्रता का उपदेश
सांझ की विरल आभा
वन-प्रान्त पर फैलती थी—
जहाँ प्रकाश और छाया
एक-दूसरे के अर्थ को छूते हुए भी
एक-दूसरे पर अधिकार न जताते थे।
उसी शांत प्रहर में
एक भिक्षु ने नत भाव से पूछा—
“भगवन्, क्या आपका वचन ही
मार्ग का अंतिम आधार है?
क्या सत्य वहाँ समाप्त होता है
जहाँ आपका स्वर रुकता है?”
बुद्ध ने धीमे से दृष्टि उठाई—
वह दृष्टि,
जिसमें पर्वत की स्थिरता थी
और निर्झर की पारदर्शिता।
“नहीं,”—उन्होंने कहा,
और यह ‘नहीं’
किसी अस्वीकार की कठोरता नहीं,
स्वतंत्रता की कोमल अनुभूति था।
“मेरे शब्द
सत्य का आवरण नहीं—
सत्य तक पहुँचने की सीढ़ियाँ भर हैं।
उन्हें मत मानो
केवल इसलिए कि मैं तुम्हारे सम्मुख हूँ,
मत मानो इसलिए कि
वे किसी प्राचीन परम्परा की छाया में खड़े हैं,
और मत मानो इसलिए
कि अनेक लोग उन्हें मान चुके हैं।”
हवा भी उस पल
मानो एक सूक्ष्म विनय में ठहर गई।
“धर्म का आधार
तुम्हारा अपना अनुभव है—
जैसे कमल की पंखुड़ी
अपने समय पर ही खुलती है,
वैसे ही सत्य
केवल तुम्हारी अंतरदृष्टि में खिलता है।
यदि मेरे उपदेश
तुम्हारे भीतर कल्याण,
शांतता,
और करुणा के आलोक को जन्म दें
तभी उन्हें स्वीकार करो।
अन्यथा
उन्हें छोड़ देने की स्वतंत्रता
ठीक उतनी ही पवित्र है।”
इस वचन में आग्रह नहीं था
किसी को बाँध लेने की इच्छा नहीं,
न ही किसी मत का बोझ।
मानो बुद्ध
अपने अनुयायियों को नहीं,
अपने-अपने प्रकाश के खोजियों को जन्म दे रहे हों।
और उस दिगंत पर
जहाँ वन का धुँधलका
धर्म की उजली शांति से मिलता था,
यह स्पष्ट हुआ कि—
बुद्ध का धर्म
स्वीकृति का प्रकाश है,
न कि किसी पर थोपी गई आस्था का अंधकार।
