सुप्पवासा सुत्त

कोलिय जनपद के सज्जन नगर में
भगवान शांत चित्त से ठहरे थे।
प्रातःकाल पात्र और चिवर लेकर
सुप्पवासा कोलिय कन्या के घर पहुँचे।
सुप्पवासा ने श्रद्धा से स्वागत किया,
स्वयं अपने हाथों से भोजन अर्पित किया।
जब भगवान ने पात्र से हाथ हटाया,
वह विनम्र होकर एक ओर बैठ गई।
भगवान ने मधुर स्वर में कहा —
“सुप्पवासा, जो स्त्री भोजन दान करती है,
वह केवल अन्न नहीं, चार वरदान देती है —
आयु का, वर्ण का, सुख का और बल का।
आयु का दान उसे दीर्घ जीवन देता है,
वर्ण का दान उसे सुंदरता और तेज प्रदान करता है,
सुख का दान उसे प्रसन्नता और आनंद देता है,
बल का दान उसे आत्मबल और सामर्थ्य प्रदान करता है।
ऐसा दान पुण्य का स्रोत है,
जो मनुष्य या देवता के लोक में फलता है।
शुद्ध, निर्मल, प्रेम से दिया गया अन्न,
जब धर्मचर्या वाले को अर्पित किया जाता है,
तो उसका फल असंख्य गुना बढ़ जाता है।
जो इस सत्य को हृदय में रखते हैं,
वे ईर्ष्या और द्वेष को त्याग देते हैं।
उनका मन निर्मल होता है,
और वे अनिन्दित होकर निर्वाण को प्राप्त करते हैं।