अमरूद और स्मृति

अब अमरूद पेड़ पर नहीं,
स्मृति में लटकता है।
कभी कोल्ड स्टोरेज में रखा था उसे,
जहाँ बर्फ की बूंदें
धीरे-धीरे उसके गालों पर फिसलती थीं।
वह ठंड अब भी हथेलियों में है,
जैसे कोई अधूरी चुम्बन —
जो छोड़ गई सुगंध, पर पूरा स्वाद नहीं।
हवा ने कहा —
“जिसे तुमने संभाला, वह पकने से पहले ही
स्मृति बन गया।”
कवि ने रात भर अमरूद को देखा,
हर बूंद, हर धड़कन के बीच —
वह जान गया —
प्रेम को जितना बचाते हैं,
वह उतना ही समय में गलता जाता है।
और जो गल गया,
वही स्थायी हो जाता है —
स्मृति के रूप में।