छत को छूकर देखो
छत को छूकर देखो
आसमां छुआ जैसा लगेगा
निकलते हुए बाहर की ओर
गुजाइंश नहीं होती
उसका अहम
पीछे देखने की
इजाजत नही देता
एक अनजान ताकत की सक्रियता
हवा का झोंका
सूखे पत्तों की आवाज
कोई बचा है क्या…
सोचते हुए कहा
बहुत कुछ बचा है
कोई ताकत डरती है
हम नही डरते हैं
संघर्ष करेंगे
छत हमारी पहुंच में होगी
आसमां छुआ है
फिर एक बार छुएंगे
टूटती हवेली का
सब कुछ टूट चूका है
सीढ़ियां भी टूट गईं
तीन पीढ़ियों के बाद
ऐसा दृश्य दिखता है
वह अकेला
सीढ़ियां बनाने की
बात बड़बड़ाते
बेसुध कुर्सी से गिर गया
आसमां को घूरता है
अधेड़ उम्र का
वह नौजवान
बहन माँ के साथ
दिल्ली में रहता है।
जंगल का श्रृंगार
हर दरख्त से टपक रहा है
ओस की बूंदें वहां
आराम करने लगीं थी
हवा चलने लगी
दीमक लगी कुर्सी पर
बैठकर देख रहा है
इस सदी के
अंतिम
जंगल का आनंद
ले रहा होगा
हवा चलने लगी।
