पतंग

चौथी मंजिल से
उतरते हुए
डाकिया सोच रहा है
कि-
आखिरी खत वह
आज का
दे आया…
बेफ्रिक सोता
आंखें खुलेंगी जब
दिखेगा वक्त
दीवार पे टंगी है घड़ी
देखोगे
दिखेगा वक्त
उस पे यकीं रखो
टूटी हुई घड़ियां रुकती हैं
घड़ियां नहीं होंगी
तब-
सूरज बतायेगा वक्त
और बचे खत गुनगुना रहे हैं
सूनों जी
जब भी
शायर बन जाउंगा
पहाड़ से कूदकर
वापस आ जाउंगा
तुम्हारे वृक्ष के
झरे हुए पीले पत्तों को
सम्भाल कर रखे हैं
आओगे तो
खोलकर किताब
देख लेना
पृष्ठ 08 पांचवें अध्याय में
पढ़ लेना
तुम रोते क्यों हो अक्सर
वक्त खराब है
रुकी हुई घड़ी भी
तुम्हें दिखायेंगी वक्त
छूकर देखता
पलटकर भी
आखिरी पन्ने पर
लिखा कि
कितने ही
खत-
लिखकर रखे हुए हैं
पोस्ट करना होगा
लेटर बॉक्स मिल नहीं रहा है
डाली डाली होते पहुंचे
ऊंचाइयों में बंदर हैं
जोड़ तोड़ कर ही
लिखतें हैं
बड़े समन्दर हैं
कटी खत
शाखों से
लिपटती रहतीं हैं
दरख्तों की जड़ें
इतनी ही
गहरी होती हैं
एक खत
खोल दिया गांठें
कि-
टुकड़ों में बांटे हैं
सम्भल के तोड़ना
गुलाब…
बेशुमार कांटे हैं
आसमां में
उड़ते मेरे खतों को
उड़ाते रहो
और ऊचाईयों में
मेरे खतों को
ठहराते रहो
आसमां में उड़ते खत में
जो वक्त ठहरा है
रुकी हुई घड़ियों में
ढूंढ रहा है वह बच्चा।