पूर्णिमा के जंगल में अमरूद का झूठ

यह झूठ भी कितना मीठा था—
दशकों पुराना, अमरूद-सा पका हुआ,
जिसे समय ने अपनी हथेली पर
धीरे-धीरे सहलाकर
और भी सुगंधित कर दिया।
दोपहर के लंच के बाद
जब दुनिया उनींदी थी,
एक दरख़्त अचानक टूट कर
ज़मीन से बात करने लगा—
मानो गिरना भी कभी-कभी
स्वीकृति का रूप होता है।
उस मोड़ पर
एक अकेला बाइक-सवार,
शायद मोहब्बत की तलाश में,
शायद कबीर की किसी अनसुनी पंक्ति का
आयाम खोजता हुआ—
जैसे प्रेम भी खेती की तरह
स्थानीय मांग से शुरू होता है
और फिर ब्रह्मांड तक फैल जाता है।
पर सवाल वही—
अमरूद इतनी ताजगी लिए कैसे खड़ा है?
बाइक किसकी थी?
और सवार अकेला क्यों?
शायद क्योंकि अकेलापन ही वह स्थान है
जहाँ प्रेम पहली बार अपनी परछाई पहचानता है।
जंगल की ख़ामोशी,
पूर्णिमा की हल्की चाँदी,
और हवा में हिलते हुए बेचैन सवाल—
इन सबके बीच
एक रोमांस जन्म लेता है,
धीमे-धीमे,
सच और झूठ के पत्तों पर
ओस की तरह चमकता हुआ।