तुम घुसाकर देखो अपने नख आनंदपाल
फाइबर के दरख़्तों पर अब परिंदे बैठते हैं,
काग़ज़ के फूलों पर तितलियाँ उतर आती हैं —
और तुम सोचते हो, यह दुनिया तुम्हारी बनाई हुई है।
पर ज़रा ठहरो,
दुनिया को बनाने का यह शौक मत पालो,
कहीं ऐसा न हो कि
समुद्र सूख जाएँ,
नदियाँ ठहर जाएँ,
सूरज हथेलियों में पिघल जाए,
और चाँद तुम्हारे होंठों से स्याही बन झर जाए।
एक सवेरे के अंधेरे में,
या किसी रात के उजाले में,
हम टकराएँगे नहीं —
बस बिखर जाएँगे,
सोए हुए बीजों की तरह,
जहाँ जागने की बात ही बवाल बन जाएगी।
हवा को तुम नहीं बना सकते,
आसमान छू भी लो तो क्या,
अगर उसे ज़मीन पर खींच लाओगे,
कपास के गोलों की तरह पैरों से नापते हुए।
घुसाओ अपने नख, आनंदपाल —
अंगारों की तपिश महसूस करो,
बर्फ की दरारों में जो दर्द है,
वह मीठा है, पर निशान छोड़ता है।
हवाएँ फूलने लगी हैं,
गुब्बारे में कसाव दिखता है,
घास घर्षण में गरम हो रही है —
ज़मीन पर परिवर्तन होना तय है।
भीगने दो धरती को,
दबाव बढ़ेगा,
गहराई मचल उठेगी हथेलियों में।
और फिर?
एंटीबायोटिक दवाओं का युग चलेगा —
जहाँ सृजन का अर्थ केवल उपचार रह जाएगा।
