दस्तक सीमा वर्मा 'अपराजिता' रजनी की नीरव बाँहों में,जब चाँदनी चुपचाप बही थी,मन-दीपक की सिहरन में,कोई अंजानी साँस रही थी।अभी तो कलिका बंद पड़ी थी,न कोई सुर, न स्वर की वाणी,किन्तु हृदय के सूने मंदिर मेंकोई बंसी बन गई कहानी।अरे! वह कौन पवन के झोंके,जो गंध भरे कुछ बोल गए,मैं हूँ तुम्हारा – यह कहकर,जीवन के सब प्रश्न खोल गए।नयनों में सुधि की रसधारें,शब्दों में आह्लाद समाया,यह स्वप्न नहीं, यह सत्य बना है,खुदा ने मुझको स्वयं छुआ है।अब न विरह की छाया शेष है,न रातों की लंबी तन्हाई,उस एक निसर्गी क्षण में जैसे,मिल गई मुझे मेरी परछाई।