दस्तक

रजनी की नीरव बाँहों में,
जब चाँदनी चुपचाप बही थी,
मन-दीपक की सिहरन में,
कोई अंजानी साँस रही थी।

अभी तो कलिका बंद पड़ी थी,
न कोई सुर, न स्वर की वाणी,
किन्तु हृदय के सूने मंदिर में
कोई बंसी बन गई कहानी।

अरे! वह कौन पवन के झोंके,
जो गंध भरे कुछ बोल गए,
मैं हूँ तुम्हारा – यह कहकर,
जीवन के सब प्रश्न खोल गए।

नयनों में सुधि की रसधारें,
शब्दों में आह्लाद समाया,
यह स्वप्न नहीं, यह सत्य बना है,
खुदा ने मुझको स्वयं छुआ है।

अब न विरह की छाया शेष है,
न रातों की लंबी तन्हाई,
उस एक निसर्गी क्षण में जैसे,
मिल गई मुझे मेरी परछाई।