छवियाँ केवल जड़ मूर्त ही नहीं होतीं
उनमें भावनाओं का ज्वार और
संवेदनाओं का संग्राम भी होता है!
जन्म के सात-आठ महीने बाद ही
माँ चल बसी थी और साथ में
मुझसे बड़ी तीन-तीन
बहनों को भी लेती गईं!
कहते हैं, तब हैजे की महामारी में
गाँव के गाँव हो रहे थे साफ
लाखों लोग अकाल कवलित हुए!
मेरे मन में माँ की
नहीं रही कोई भी छवि!
जंगली पौधे की तरह
यों ही पनपता रहा….
ग्रीष्म, वर्षा, शीत हर मौसम की
मार अनवरत सहता रहा!
जीवन में मेरे रोदन का अर्थ था
न हंसी का ही कोई अर्थ
बस निरपेक्ष गति में बढ़ता रहा !
समय नदी सा बहता रहा
विवाह के बाद संगिनी साथ आई
जीवन को एक नई दिशा मिली!
जीवन के तमाम सुख-दुःख में
पत्नी का हस्तक्षेप बढ़ता गया
दो-दो बच्चे आए, बड़े होते गए
मेरी उम्र भी
उसी रफ्तार में भागती गयी!
जब कभी किसी के जीवन में
सुनता उसकी माँ के बारे में
कोई भाव मुझमें नहीं उभरता!
एक बार गाँव गया
अपनी बूढ़ी बुआ के संग
कुछ दिन बिताने के लिए
जिसने माँ की जगह
मेरी परवरिश की थी!
बुआ खाट पकड़ चुकी थी
प्रसंग एक आने पर
जाने कैसे तो मैंने पूछ लिया था–
मेरी माँ देखने में कैसी लगती थी?
मैंने महसूस किया था कि
बुआ के चेहरे पर एक तेज कौंधी थी
उसने बेसाख्ता कहा-
तुम अपनी माँ पर ही तो गये हो
नाक -नक्श सब कुछ
हुबहू तुम्हारी तरह ही थी !
सुन कर बुआ की बात
मैं हतप्रभ रह गया था!
शहर अपने घर लौटने पर
पहली बार मैंने
आईने में खुद को गौर से निहारा
निहारता ही रहा था!
आईने के सामने मुझे खड़ा देखकर
पत्नी ने मुझे टोका–
बुढ़ापे में भी खुद को
आईने में देखने की लत गयी नहीं?
शरीर कमजोर पड़ता जा रहा
और मन की जवानी उमड़ रही,
जरा ये तो सोचो बच्चे बड़े हो गये!
सुन कर पत्नी के ताने
लहका तो, पर उसे कैसे बताता
आईने में मैं खुद को नहीं
अपनी माँ को देखता हूँ..!
अब जब कभी मैं
होता हूँ नितांत अकेला,
मुझे किसी वत्सल भावना की
छांव की पड़ती है जरूरत
मैं आईने के सामने जा खड़ा होता हूँ!
हाँ, अब जाकर जान पाया हूँ
छवियाँ केवल जड़..मूर्त ही नहीं होती
उसमें भावनाओं का ज्वार और
संवेदनाओं का संग्राम भी होता है !!
