दोस्त श्रेष्ठ है धाम शिव नारायण पर्वत अडिग खड़ा रहा, झरना रिस रिस जाय। किसन बंशी टेर रहे, राधा लपकी जाय॥निज मेरा खुल रहा, साथी तेरे पास। जीवन उसका धन्य है, साथी जिसके पास॥खोल सकूँ निज मन जहाँ, पवित्र है वह धाम। दुनिया में रिश्ते नहीं, दोस्त श्रेष्ठ है धाम॥जीना और मरना यहाँ, शाश्वत है यह काम। दोस्त जिसके पास हुए, खत्म न उसके काम॥मर-मर कर जीते रहे, जीवन हो न सकाम। पल भर जीवन जी लिया, हो गये मुक्त काम॥रब मेरे मालिक भये, रब ही दोस्त मिलाय। प्रेम नाव ये खे रहे, वह ही पार लगाय॥