मन संशय में शिव नारायण मन संशय में बह रहा, तन चूर हो तनाव। रब जाने क्या हो यहाँ, पार हो न हो नाव॥जीने का मकसद नहीं, संभ्रम में रह कैद। बंधन सब के सब कटे, कर्म हमारे बैद॥फंस गए द्विधा में यहाँ, कर्म बड़ा या मोह। रब जी मेरे द्वार को, खोल न किसी बिछोह॥साधना में लीन रहे, कर्म करे हर ध्यान। रब जी फल उसको मिले, पूजे नित ही ज्ञान॥गुस्से में मन तप रहा, दहक रहा तन ताप। ध्यान रहे निज स्वार्थ ही, परहित सोच न आप॥‘शिव’ नश्वर संसार में, बचा रहा कब कौन। अवसर तेरे हाथ है, परहित कर्म न मौन॥