मोर का दर्द

इंद्रधनुषी सुसज्जित रंग,
हर्षाए मन वन-उपवन।
सुन्दर सुशोभित मनोहर पंख,
ताज कलंगी औ नीलकंठ।।

ना खुश होकर ही नाचे मोर,
जब छाए घटा घनघोर।
रो- रो कर भी नाचे मोर,
ये दर्द ना कोई जाने और।।

गर्व करे कभी अपने रंग पर
शर्म करे कभी अपने पद पर।
करे मन जो आंनद विभोर,
पंजा देख हो भाव विभोर।।

थक जाए नाच-नाच कर
कैसे बताए अपना संताप पर?
बहे नैनों से नयननीर;
किसे बताए दर्द श्रीहीन?

झर गए सब मंजुल पंख,
मोरनी तेरा ये कैसा दंभ?
तेरा हठ कितना अनम्य!
ना आए तुझे रहम?

प्रकृति तेरा कैसा दस्तूर?
छीन ली आरज़ू देकर रूप।
ना जीवन में करें गुरूर,
सुख दुख रहते ना समरूप।।