कस्तूरी मृग

देखा वन में अनुपम दृश्य,
मनमोहक कस्तूरी मृग।
प्रेम छलकाता मृग नयन,
क्या ढूंढ रहा वन उपवन?
कभी पत्ते, कभी सुंघे फूल,
झाड़ियों में चुभ जाते शूल।
भटक गया है शायद वन में,
या खुद को ही गया है भूल।।

देखे बार-बार मुड़कर,
जाने कहां हो गया ओझल?
कहीं से आकर लगा एक तीर,
वही जमीं पर गया वो गिर।
शरीर पर गहरे थे घाव,
ना रुक रहे थे रक्तस्राव।
बह रहे झर-झर नयन,
हार गया जिन्दगी की जंग।।

खुद से ही अनजान कस्तूरी,
खुद से खुद की पहचान जरूरी।
कर ली अपने आप से दूरी,
अपने अंदर ना झांके कस्तूरी।।
कर रहा था उसकी तलाश,
जो सुगंध थी उसी के पास।
काश ! मन कर लेता शांत,
कर पाता अपनी पहचान।।