क्या कुछ कहती है रजनी
क्या-क्या कुछ कहती है रजनी
मानव तुम कब समझोगे
कब समझोगे तुम समय गति
करते हो व्यर्थ प्रलाप,कब समझोगे
जीवन जीने का है यही ध्रुव सत्य
आने को है प्रभात, बतलाती रजनी।
तुम जीवन से क्या अब सीख रहे
कर्मों के कोरे कागज पर क्या लिख रहे
यह सत्य ही हो, समय धुरी अब ठीक रहे
हो काश यही, जीवन पथ में ना तकलीफ रहे
जो मिलता है पथ पर, हो उसका खुद कर्त्य
प्रथम रश्मि को फिर दिखलाती है रजनी।
तुम किए कर्म का भाव से ना मुख मोड़ो
पथ में कंकर है तो क्या, ना चलना छोड़ो
कोरे कागज पर यूं व्यर्थ चित्र को ना दौड़ो
अहंकार के पत्थर से जीवन शीशा ना तोड़ो
खुद को खुद से लगा न तुम ऐसा कोई शर्त
उषा किरण की आभा पर इठलाती रजनी।
तुम तो मान भी लो, बीत गया सो हुआ अतीत
उन काले पन्नों से तुमको क्या करना प्रतीत
फिर से क्यों तुम करते हो वक्त व्यर्थ व्यतीत
क्यों अब उलझाने की लालसा है जीवन गणित
खुद से ही खुद को कहीं ना कर डालो व्यर्थ
बस यही गुणा-भाग की दुविधा को दिखलाती रजनी।
