निर्णय वो कर लेता शायद तो
निर्णय वो कर लेता शायद तो
पथ को मिल जाती चेतनता
फिर से जीवंत होता सलिल प्रवाह
जिसकी था जन-जन को चाह
पर वो स्वभाव में ढल ना सका
अपने हृदय की तस्वीर बदल ना सका !
वो था किंचित थका हुआ ऐसा भी
जैसे बहती नदी की धारा रुक-रुक जाती हो
व्यथित हुआ था वो, जो था अनुचित भी
जैसे कि लगी आग प्रलय रुप बनाती हो
पर वो खुद से खुद को छल ना सका
अपने ही शतरंज पे वो चाल को चल ना सका !
निर्णय वो कर देता तो क्या से क्या हो जाता
शायद यह भी होता गरल सुधा सा हो जाता
मन की कड़वाहट कहीं राह में खो जाती
जीवन में फैली दुविधा का जाला खो जाता
पर वो खुद के ही बनाए लीक पर चल ना सका
शायद तो वो खुद ही से जल ना सका।
आज व्यथित होकर भी वो कैसे कदम बढाएगा
जो तस्वीर पुरानी है कैसे वो आज जलाएगा
कैसे वो बतलाएगा कि बताने की बात ही काफी है
हार भी जाए तो खुद को कैसे समझा वो पाएगा
पर वो खुद की ही परछाई में ढल ना सका
आया हवा का झोंका और वो संभल ना सका।
