परिणाम निरर्थक होगा
धूमिल ! कठिन है हृदय के घाव छिपाना।
कठिन है रिसते हुए ज़ख्म भुलाना।
कठिन है तूफानी लहरों पे नाव चलाना।
कठिन है वेदना में मंद-मंद मुस्काना।
सही-सही अनुमान नहीं हो, ज्ञान निरर्थक होगा।
छोड़ो भी अभिमान, इसका परिणाम निरर्थक होगा।।
माना कि तुमने संचित किया समय को पहले।
आज तो मेरा समय हुआ है, थोड़ा चुप तो रह ले।
अति रंजित न हो पटल छवि से, अपनी तो कह ले।
आया अगर समय तूफान सा बनके, चुपके से सह ले।
अब जो न चेते तो पछताओगे, अंजाम निरर्थक होगा।
समय गति का नियम अलग है, परिणाम निरर्थक होगा।।
अब तो बात को समझो, चौसर ऐसे न खेलो।
अगर हुआ उलटा-पलटा, सीख तो इतनी ले-लो।
आती है तूफान वेगवान हो, पाँव टेक कर झेलो।
आहट भी होगा पथ पर, दरिया को तुम तो हेलो।
बीत गया जो समय परिधि, तेरा हर काम निरर्थक होगा।
झंझावात की गति अलग है, परिणाम निरर्थक होगा।।
उपमानों के आभूषण को लेकर, भ्रमित न होने पाओ।
अभी तो निकली प्रथम रश्मि, ऐसे ही न शोर मचाओ।
आज तो मुखरीत बन धूमिल, जीवन की ज्योत जलाओ।
अभी तो संभलो, कहीं ऐसा न हो, समय गए पछताओ।
दिन बीते पथ पर जो अटकोगे, यह शाम निरर्थक होगा।
उपवन का बाग मुरझाएगा जो, परिणाम निरर्थक होगा।।
धूमिल ! कब तक रहोगे ऐसे ही पथ पर नजर गड़ाए।
तुम उलझोगे उलझन से, कहीं समय बीत न जाए।
तुम तीन-पांच को जोड़ो जब तक, कांटा चुभ न जाए।
सही-गलत की हृदय धारणा, कहीं जीवन को आग लगाए।
धूमिल तुम भ्रमित हुए जो ऐसे, तेरा नाम निरर्थक होगा।
आहट फिर भी समझ सको न, परिणाम निरर्थक होगा।
