जीवन जब उन्मुक्त बना
अरुणोदय के यूँ बादल में छिप जाने से,
अहो ! कुंठित अब मेरे विवेक हुए।
आडंबर अंधकार का, दूर तक जो फैला था,
भ्रमित हुआ, तरू लिपटा बेल विषैला था।
जब यह सोचा, कैसे नयन से नीर बहाएँ,
होनी अनहोनी में बदला, वाम विधाता लेख हुए।
अतृप्त हुई इच्छाएँ, कहूँ बनी वेगवान हैं कैसे,
मन शीतलता को ढूँढे, यह चलती लहरों जैसे।
शून्य का प्रभाव रिक्त हुआ, हो गई शहर के जैसे,
उन्मुक्त नहीं रह पाया, शायद कहता हूँ वैसे।
उफान पर जीवन नदिया, कैसे नाव चलाए,
आहट दूश्चिंता का हुआ, आहत यह देख हुए।
आडंबर का श्रृंगार करूँ, दर्पण विश्वास का लेकर,
फिर भी मन संतप्त हुआ, कोरे सपने से कर।
मन मुक्त कहीं बन जाए भी, कुछ जीवन को देकर,
कोशिश तो कर लेता, लहर पर नौका खे कर।
मन उलझा झंझावात में, हम कैसे बात बनाएँ !
अहो ! दग्ध हृदय पर कुठाराघात के वेग हुए।
विचलित हूँ मलिनता अब हृदय को घेर ही लेगा,
मैं कब तक प्रहार सहूँगा, जख्म देख ही लेगा।
उपमाओं का वस्त्र सी लूँगा, जब तक तन ढकने को,
अनुमानित ही है बात, यह आँखों को सेंक ही लेगा।
अभी तो बीती बात है, कैसे फिर से वही दुहराएँ,
जीवन जब उन्मुक्त बना, लहरों की धार अनेक हुए।
मन शंकित है, काश अरुणोदय छिपा न होता,
अभी जो घटित हुआ है, विधि ने लिखा न होता।
काश ! कि दुविधा अंबर में इतना खिंचा न होता,
मैं पढ लेता उस महता को, जो कि मिटा न होता।
दो पल पहले ही घटित हुआ, कैसे हालात भुलाएँ।
अहो ! दुविधा आई जैसे ही, विचलित आते देख हुए।
